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अमेरिका के नालंदा विश्वविद्यालय में एक शाम

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दयाशंकर शुक्‍ल: मेरी विदेश डायरी-3 : जॉन्स हापकिंस अमेरिका की पहली बड़ी रिसर्च यूनिवर्सिटी है : कैम्पस हरे भरे पेड़ों और लकड़ी की बेंचों से घिरा है : नालंदा दुनिया का शायद पहला अंतर्राष्ट्रीय आवासीय विश्वविद्यालय था : रात के साढ़े आठ बजे हैं। पर सूरज अभी ढला नहीं है। धूप इतनी की जैसे शाम के पांच बजे हों। लेकिन आंखों में गजब की नींद भर गई है। शरीर की घड़ी अभी तक हिन्दुस्तान की बैट्री से चल रही है। यहां वक्त भारत से साढे नौ घंटे पीछे है। जोन्स हापकिंस यूनीवर्सिटी ने 29 देशों से आए अपने मेहमानों को जिस चार्ली कामन्स हास्टल में ठहराया है वह किसी पांच सितारा होटल से कम नहीं। 7वीं मंजिल पर एक छोटा सा वातानूकूलित कमरा। स्टडी टेबल, रैक, एक अलमारी और एक गद्देदार बेड। लिखने पढ़ने में खो गए तो सच मानिए दुनिया जहान भूल जाएँगे।

कांच की लम्बी-सी खिड़की से पूरा कैम्पस दिखता है। नीचे चौड़ी सड़क पर दौड़ती कारें। शाटर्स और टीशर्ट में घूमते लड़के। पांवों में स्‍केट्स बांध कर सड़कों पर फिसलती लड़कियां। सामने चौ-रस्ते पर सब-वे चेन का रेस्त्रां है जो 24 घंटे खुला रहता है। उसके ठीक बगल में यूनिवर्सिटी मार्केट नाम की एक दुकान भी चौबीस घंटे खुली रहती है। हैरत की बात है कि नाइट लाइफ के नाम पर यहां कुछ नहीं। रात्रि भोज का अंतिम वक्त सात बजे है। इसके बाद सन्नाटा। 1876 में स्थापित जॉन्स हापकिंस अमेरिका की पहली बड़ी रिसर्च यूनिवर्सिटी है। हिन्दुस्तान में अभी तक प्राइवेट विश्वविद्यालयों के लिए कानून तक नहीं बन सके। और यहाँ 1857 के भारतीय विद्रोह के पहले से निजी विश्वविद्यालय ट्रस्ट के जरिए चल रहा है।

वाशिंगटन डीसी जैसे अमेरिकी राज्य के अलावा चीन, इटली और सिंगापुर जैसे देशों में इस विश्वविद्यालय का फुलटाइम कैम्पस है। लेकिन बाल्टीमोर शहर के बाहर 140 एकड़ में बसा यह पुराना कैम्पस कई मायनों में अदभुत है। लाल ईंट और सफेद संगमरमर के मेल से बनी सैकड़ों इमारतें पूरे कैम्पस को अलग पहचान देती हैं। पूरा कैम्पस हरे भरे पेड़ों और लकड़ी की बेंचों से घिरा है। सड़क के किनारे बनी क्यारियों में भी मिट्टी की जगह लकड़ी का बुरादा और वुडन चिप्स के टुकड़े डाले गए हैं। शायद इसीलिए विवि ने इस कैम्पस को होमवुड का नाम दिया है। विश्वविद्यालय की कक्षाएं यूरोप के किसी ओपरा थिएटर की याद दिलाती हैं। सीढ़ीदार कुर्सियां और सामने बालकनी। सामने विशालकाय ब्लैक बोर्ड। हर कमरे में अमेरिका के मशहूर नायकों की तस्वीरें लगी हैं। नीचे से शिक्षक हर छात्र से संवाद स्थापित कर सकता है। हम कक्षा से बाहर निकलते हैं। सामने बहुत दूर तक फैले हरी घास के खूबसूरत लॉन में एक छात्रा बिकनी में अर्ध नग्न सूर्य स्नान का आनंद ले रही  है। कैम्पस में यह दृश्य लगभग सबको अटपटा लगा। लेकिन अमेरिका इन सब वर्जनाओं से अब बहुत आगे निकल चुका है।

विश्वविद्यालय की मुख्य इमारत के सामने का पूरा इलाका आवासीय है। एकरूपता देने के लिए इन्हें भी लाल ईट और संगमरमर के मेल से बनाया गया है। सड़क के दोनों तरफ काटेज नुमा घरों की कतार है। हर घर के सामने एक छोटा सा बागीचा। हर बगीचे में सूरजमुखी के खिले हुए फूल। ये पुराने घर विश्वविद्यालय के शिक्षकों व अन्य अधिकारियों के हैं। वास्तुकारों ने इन घरों में पार्किंग की जगह नहीं दी थी। दिल्ली और दूसरे महानगरों की तरह लोग अपनी कारें घर के सामने नहीं खड़ी करते। कारें पार्क करने के लिए हर स्ट्रीट की अपनी दस मंजिला पार्किंग है। लोग अपनी गाड़ियां इन मल्टी स्टोरी पार्किंग में खड़ी करके अपने घरों तक पैदल चले जाते हैं।

कैम्पस में घूमते वक्त न जाने क्यों मुझे नालंदा का ऐतिहासिक परिसर याद आ रहा है। मैंने नालंदा तो नहीं देखा लेकिन हापकिंस कैम्पस देखकर मैं अंदाजा लगा सकता हूं कि नालंदा कैसा रहा होगा। बिहार से 56 मील दूर दक्षिण पूर्व में नालंदा दुनिया का शायद पहला अंतर्राष्ट्रीय आवासीय विश्वविद्यालय था। 5वीं सदी में स्थापित यह विश्वविद्यालय अगले पाँच दशकों तक शैक्षिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र रहा। इसमें दस हजार छात्र और दो हजार शिक्षक हुआ करते थे। बाद में आक्रमणकारियों ने इसे आग के हवाले कर दिया था। भारत में नालंदा का नामोनिशान मिट गया। हमने कभी दूसरा नालंदा बनाने की कोशिश भी नहीं की। लेकिन हापकिंस जैसे लोग इतिहास को पत्थरों में ढाल कर नया इतिहास रच गए। चार्ल्‍स कामन्स के सामने ही जोन्स हापकिंस की प्रतिमा लगी है। प्रतिमा के एक तरफ महिला और दूसरी तरफ एक पुरुष छात्र को बैठा दिखाया गया हैं। हापकिंस निसंतान मरे थे और अपनी सारी दौलत वह इस विश्वविद्यालय के नाम कर गए। विश्वविद्यालय के पहले प्रेसिडेंट डेनियल कोट का मशहूर सूत्र वाक्य है-‘सत्य बोलिए क्योंकि सत्य आपको मुक्त करता है।’ खिड़की से देखता हूं नीचे सड़क पर सन्नाटा पसरा है। सूनी सड़क पर एक अंतहीन मौन। सोचता हूं यही कैम्पस में कहीं हापकिंस की कब्र भी होनी चाहिए। अगर होती तो वहां हिन्दुस्तान की तरफ से श्रद्धा के दो फूल जरूर चढ़ा देता। रात के 1 बज गए हैं। अब मुझे सो जाना चाहिए।

दयाशंकर शुक्ल सागर 'दैनिक हिंदुस्तान' लखनऊ में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. सागर को अमेरिका की जोन्स हापकिंस यूनिवर्सिटी ने फैलोशिप-2010 के लिए चयनित किया है. इन दिनों वे अमेरिका की यात्रा पर हैं.

Comments
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amit singh lucknow. hindustan 2010-07-21 16:28:50

respected sir,
main aapka lekh roj read kar raha hun.aapke baare main bhadas se sabkuch pahle pta lag ja raha hai. aap kaisse hain. i am remembering you verry deeply. aap ka chota bahi amit singh.
shekhar 2010-07-22 12:48:53

bariya likh rahe hai. parhne wala hapkins hi pahunch jata hai.
DR.MADHUKAR TIWARI 2010-07-23 16:44:11

respected bhia
apki yatra ke bare me sub kuch jan kar romanchak lag raha hai bada gyan mil raha hai
dr madhukar
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