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मीडिया पर क्‍यों गुस्‍सा उतार रहे हैं लोग!

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: मीडिया को अभिव्यक्ति की आजादी है तो हमें भी विरोध की आजादी है : पूरी मीडिया पर लाठी तक चलवाने में अमिताभ को हिचक नहीं होती : पत्रकारों को अक्सर इस तरह की दिक्कतों का सामना करना ही पड़ता है :हालिया रिलीज फिल्म 'लम्हा' में अनुपम खेर का एक डायलॉग है 'अगर एश्वर्या चांद नहीं देख पातीं तो मीडिया में वह भी खबर बन जाती है पर कश्मीर में न जाने कितनी महिलाएं हैं, जिन्होंने अपने पति को न जाने कितने दिनों से नहीं देखा है।' डायलॉग को लेकर फिल्म के निर्देशक राहुल ढोलकिया और अनुपम खेर बहुत डरे हुए थे कि कहीं अमिताभ बच्चन नाराज न हो जाएं। लेकिन उनकी खुशी का तब कोई ठिकाना नहीं रहा जब अमिताभ ने इस पर ऐतराज नहीं जताया बल्कि कह दिया कि यह सच्चाई है। फिल्म के निर्देशक राहुल कहते हैं कि इसमें एश्वर्या का मजाक नहीं उड़ाया गया है बल्कि आजकल की व्यवस्था पर एक प्रहार किया गया है।

जब इस डायलॉग पर अमिताभ की राय मांगी गई तो उन्होंने इसे स्वीकार करने में तनिक भी देरी नहीं की। उन्होंने कहा कि जो बात कही गई है वह शत प्रतिशत सही है। एक बात जो अमिताभ ने नहीं कही, वह यह कि इसमें मीडिया को निशाना बनाया गया है, इसलिए कोई प्रश्न ही नहीं था कि अमिताभ इस डायलॉग को फिल्म से हटाने या फिर किसी और प्रकार से रखने के लिए कहते।कुछ दिन पहले ही अंग्रेजी के एक टीवी चैनल ने एक संगठन का स्टिंग ऑपरेशन कर उसके मंसूबों का खुलासा कर दिया। संगठन के कार्यकर्ता इतने नाराज हुए कि उन्होंने संबंधित टीवी चैनल के दफ्तर पर ही हमला बोल दिया और जमकर तोडफ़ोड़ की। बात जब संगठन के बड़े नेताओं तक पहुंची तो उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं ने जो कुछ भी किया है वह सही है। अगर मीडिया को अभिव्यक्ति की आजादी है तो हमें भी विरोध की आजादी है। विभिन्न टीवी चैनलों पर तोडफ़ोड़ के जो दृश्य दिखाए जा रहे थे उसमें साफ दिख रहा था कि वहां सुरक्षा के लिए मौजूद पुलिसकर्मी मूक दर्शक बने थे। ऐसा लग रहा था जैसे वे खुद चाह रहे हो कि मीडिया वाले पिटते रहें।

इन सब बातों पर गौर करें तो एक बात साफ है कि कोई व्यक्ति हो या संगठन, मीडिया को गरियाने का मौका कोई भी हाथ से नहीं जाने देता। अमिताभ के मन में तो मीडिया के प्रति इतना क्रोध भरा है कि न चाहते हुए भी वह समय समय पर दिखाई पड़ ही जाता है। बोफोर्स कांड के समय में मीडिया की रिपोर्ट से अमिताभ इतना खफा हुए थे कि काफी समय तक उन्होंने कोई साक्षात्कार ही नहीं दिया। अगर मीडिया के बिना उनका गुजारा हो जाए तो शायद वह आज भी उससे बात न करें। अभी भी अमिताभ जब भी मीडिया से मिलते हैं तो सिर्फ अपने मतलब के लिए। जब उनकी कोई फिल्म रिलीज हो रही होती है तो वह टीवी चैनल के दफ्तर में आकर बैठ जाते जाते हैं, लेकिन जब उनके बेटे की शादी होती है तो देश की पूरी मीडिया पर लाठी तक चलवाने में अमिताभ को हिचक नहीं होती।

एक ऐसा संगठन जो अपने आप को अनुशासित और भारतीय होने का दंभ भरता है उसके प्रवक्ता कहते हैं कि मीडिया को स्वतंत्रता है तो उन्हें भी है। उनकी स्वतंत्रता इसमें निहित है कि वह किसी सम्मानित और बड़े मीडिया हाउस के दफ्तर में हमला कर तोडफ़ोड़ करें। आश्चर्य तो तब होता है जब उनके वरिष्ठ भी इस पर आपत्ति नहीं करते और इसे जायज ठहराते हैं। जहां तक पुलिस की भूमिका की बात की जाए तो पुलिस और मीडिया में हमेशा ठनी ही रहती है। पुलिस का अदना सा सिपाही हो या फिर वरिष्ठ अधिकारी, हमेशा इसी फिराक में रहता है कि किस तरह मौका निकाल कर मीडियाकर्मियों को पीटा जाए या कुछ ऐसा किया जाए, जिसे वह हमेशा याद रखें। कस्बे, शहर और जिला स्तर के पत्रकारों को अक्सर इस तरह की दिक्कतों का सामना करना ही पड़ता है। अब राष्ट्रीय स्तर पर भी यह देखने को मिल रहा है।मीडिया पर हमले के बाद सिर्फ टीवी में दिखने और अखबार में छपने के लिए सभी नेताओं ने कह दिया कि यह गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए पर उसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। क्यों? क्योंकि कहीं न कहीं उसे भी लगा कि चलो ठीक ही हुआ। ये मीडिया वाले इसी लायक हैं। अब खुलेआम तो कह नहीं सकते कि ठीक हुआ तो चुप ही रहा जाए ज्यादा बेहतर है।

अब सवाल यह उठता है कि मीडिया के खिलाफ लोगों में इतना आक्रोश आखिर क्यों है? क्या वाकई मीडिया रास्ता भटक गया है या फिर भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है और साजिशें इतनी ज्यादा है कि जब मीडिया इनका खुलासा करती है तो वे बर्दाश्त नहीं कर पाते? और कहीं न कहीं मीडिया को सबक सिखाने का मौका तलाशते हैं! देश में बहुत से अखबार हैं और सभी में लगभग रोज किसी न किसी भ्रष्टाचार की पोल खोली जाती है, फिर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। रोज उसी गति से भ्रष्टाचार होता रहता है। टीवी में भी किसी न किसी स्‍कैंडल का खुलासा होता ही रहता है। फिर भी ऐसे मामले कम नहीं हो रहे। तो क्या मीडिया का जिसके लिए जन्म हुआ, उसे भूला दिया जाना चाहिए। या फिर यूं ही पिटते हुए अपने काम को अंजाम देते रहना चाहिए, यह सोचते हुए कि अच्छा काम करोगे तो विरोध तो होगा ही!

लेखक पंकज मिश्रा पत्रकार है और पत्रिका, ग्‍वालियर के साथ जुड़े हैं.

Comments
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मीडिया पहले अपना घर तो ठीक करे
lokendra singh 2010-07-21 18:06:47


पंकज जी सबसे पहले आपके सवाल का जवाब। आपने पूछा है कि क्या मीडिया रास्ता भटक गया है? तो उसका अधिकांश लोग उसका उत्तर 'हांÓ में ही देंगे। हां कुछ इसे स्वीकार न करें ऐसे लोग भी हो सकते हैं। अब बात करते हैं अमिताभ या उन खास लोगों की जो मीडिया का इस्तेमाल करते हैं फिर उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंकते हैं और गरियाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। मुझे यह समझ नहीं आया कि बुद्धिजीवियों और चतुर सियारों से भरी मीडिया खुद का इस्तेमाल कैसे हो जाने देता है? रही बात भ्रष्टाचार तो मीडिया भी इसमें आकंठ डूबी है, लेकिन यह कहां छप सकता है और कौन उसका स्टिंग ऑपरेशन कर सकता है? अब उपरोक्त पंक्ति का अनर्थ मत निकालिएगा क्योंकि मैं भ्रष्टाचार की तरफदारी नहीं कर रहा हूं। रामकृष्ण परमहंस के पास एक माता अपने बालक को लेकर आईं और महाराज से निवेदन किया कि इसकी अत्यधिक गुड़ खाने की आदत छुड़वा दीजिए। महाराज ने उन्हें अगली बार आने को कहा। वह फिर आई, महाराज ने फिर उन्हें अगली बार आने को कहा। यह क्रम चार-पांच बार चला। अंत में वे बालक से बोले बेटा अत्यधिक गुड़ खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ऐसा मत किया करो। यह सुनकर मां बोली-महाराज यह तो आप तब ही कह देते इतनी बार परेशान क्यों किया? तब परमहंस जी ने कहा-माता पहले मुझे भी गुड़ खाने की आदत थी। जब वह दोष मुझमे ही था तो बालक को किस मुंह से मना करता। कहने का अर्थ है मीडिया पहले अपना घर तो ठीक करे।
जिस चैनल ने संगठन के तथाकथित कार्यकर्ताओं का स्टिंग क्यों किया और स्टिंग में क्या किया? इस पर खूब सवाल खड़े हो रहे हैं। तमाम पत्रकार इसे टीआरपी का ओछा फंडा बता रहे हैं। स्टिंग में जो दिखाया और जो संवाद रहे उन पर किसी ने गौर नहीं किया। करते भी क्यों? उस स्टिंग से एक ऐसे संगठन का नाम जो जुड़ा था जिस पर कीचड़ उछालने के लिए मीडिया के कुछ लोग हमेशा तैयार रहते हैं। इसके पीछे भी तमाम कारण हैं। स्ंिटग में जो वार्तालाप चला वह स्वयं संदेह बढ़ा रहा है। मीडिया का काम संदेश बढ़ाना नहीं बल्कि संदेह खत्म करना है। रही बात चैनल पर कथित हमले की तो जो कोई इस कृत्य के पीछे है वह दोषी है, चाहे वह चैनल ही स्वयं क्यों न हो या फिर उक्त संगठन। इसकी कड़े शब्दों में आलोचना की जानी चाहिए।
हां चलते-चलते एक बात और। उक्त संगठन ने बहुत पहले पहले ही प्रवक्ता पद समाप्त कर दिया है। अत: जिस कथित प्रवक्ता ने जो भी बयान जारी किया है वह उस संगठन के मत का प्रतिनिधित्व नहीं करता वरन् वह उसकी व्यक्तिगत राह अवश्य हो सकती है।
जब मीडिया किसी को गरियाने का मौका नहीं छोड़ती तो कोई क्यों मीडिया को गरियाने का मौका छोड़े।
avadhesh gupta 2010-07-22 16:31:31

पंकज जी, आपने मीडिया की दुखती रग पर हाथ रखा है। हालांकि मैंने फिल्म तो नहीं देखी, लेकिन मीडिया के बारे में आपने हकीकत बयां की है। मीडिया रास्ता भटक गया है, ये बहस का विषय है। हालांकि जो कुछ हुआ, वह गलत था। लाख टके का सवाल ये है कि चाहे वह राजनेता, अभिनेता, खिलाड़ी या आम आदमी ही क्यों न हो। मीडिया के प्रति चिढ़ सी हो गई है। कोई खास अच्छी छवि लोगों के सामने मीडिया की नहीं है। दरअसल, वे जान गए हैं कि मीडिया को कैसे इस्तेमाल करना है ? बिल्कुल दूध में गिरी मक्खी की तरह। आखिर ऐसा क्यों ? प्रतिस्पद्र्धा और टीआरपी के चक्कर में कुछ का कुछ परोस रहे हैं? इतने सारे चैनल और अखबारों के लिए खबर नहीं है? सानिया क्या पहनती है वो खबर है, लेकिन देश के हजारों बच्चों के तन पर कपड़े नहीं वो खबर नहीं? लोग सिर्फ सेलिब्रिटी को ही देखना चाहते हैं, इससे दीगर कुछ नहीं? मीडिया पंडितों को समीक्षा करनी होगी। और बुराईयों को दूर हटाकर मीडिया का एक साफ-सुथरा चेहरा लोगों के सामने लाना होगा।
जब कोई पत्रकार किसी ऑफिस में या थाने में खबर के सिलसिले में जाता है, तो सामने वाला भले ही अभिवादन की मुद्रा में दिखे लेकिन अंदर तो यही कहता है, कहां से आ गया है। मैं काम कैसे करूं। अनुभव के आधार पर कह रहा हूं। लेकिन यदि उसी व्यक्ति को आपसे कोई काम होगा तो वही आगे-पीछे फिरेगा, आपको दस बार फोन करेगा। अगर देखा जाए तो मीडिया का शुरू से ही विरोध होता आ रहा है। जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हमारे दिग्गज पत्र निकालते थे, उन्हें दबा दिया जाता था, मारा जाता था, लाइसेंस निरस्त कर दिया जाता था, प्रतियां फाड़ दी जाती थीं और भी न जाने क्या-क्या।
इतिहास गवाह है मीडिया के प्रति गुस्सा उतारने का मौका कोई नहीं छोड़ता। क्या हम अपनी ताकत को भूल गए ? ऐसे लोगों को सबक सिखाना जरूरी हो गया है। सब जानते हैं कि मीडिया चाहे तो एक रात में स्टार बना दे, चाहे तो सड़क पर ले आए। फिर क्यों हम ऐसे लोगों को इतना भाव देते हैं। सेलिब्रिटी हों तो बनी रहें। कितना भी बड़ा नेता हो तो बना रहे। हम जनता के लिए हैं, उसके दुखदर्द में शामिल होकर काम करें। चंद राजनेताओं और सेलिब्रिटी के चक्कर में पड़ जाते हैं। धिक्कार है, हम पर। अगर हम ऐसा करेंगे तो फिर देखिए कभी कोई इस तरह की जुर्रत नहीं करेगा। लेकिन हां, अपनी हद में रहकर। अमिताभ बच्चन की बात करें तो कभी अमिताभ मीडिया के मुरीद हुआ करते थे। लेकिन कुछ तो ऐसा हुआ, जिससे उन्हें मीडिया के प्रति ऐसा रूखा बर्ताव करने पर मजबूर कर दिया। सोचा होगा।


such kaha aap ney
pradeep dubey 2010-07-24 16:04:00

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manoj 2010-07-26 12:19:13

इन दिनों पत्रकारिता को लेकर काफी बहस हो रही है। बहस यदि पत्रकारिता के कार्य और व्यवहार की आलोचना को लेकर होती तो ठीक है बल्कि उसकी सीमा को लेकर हो रही है। वे लोग पत्रकारिता की सीमारेखा की बातंे कर रहे हैं जिन्होंने हर हमेशा अपनी सीमाएं लांघी हैं। इन दिनों पत्रकारिता की आलोचना शब्दों से नहीं, बल्कि उन पर हमला कर हो रही है जिसकी किसी भी स्थिति में निंदा होनी चाहिए। मेरा अपना मानना है कि पत्रकारिता संसार का सबसे पवित्र पेशा है और वह हमेशा से अपनी जवाबदारी निभाता आया है। मुझे व्यक्तिगत रूप् से दुख है कि हमारे लोग ही एक आवाज में अपने बारे में बात नहीं कर पा रहे हैं। ग्वालियर से साथी पंकज की बातों से मैं सहमत हूं। पंकज के लिखे के बहाने एक टिप्पणी में मैं कुछ अनुभवों को सुनाना चाहूंगा कि जो लोग अखबारों से शीर्ष पर पहुंच गये और आज उसी के बूते शीर्ष पर खड़े हैं किन्तु लगभग नफरत की दृष्टि भी बनाये हुए हैं। करेगा। पंकज बहुत सुंदर लिखा है। बधाई।
मैं अपनी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों से इसे संसार का सबसे पवित्र पेशा मानकर चला हूं। पत्रकारिता की आलोचना आज और अभी नहीं हो रही है बल्कि यह पुरानी परम्परा है। साहित्य और आलोचना का जिस तरह का साथ है लगभग पत्रकारिता में भी वही परम्परा है किन्तु इन दिनों आलोचना के नाम पर हमले हो रहे हैं। शाब्दिक और शारीरिक। संभवतः पत्रकारिता ही एकमात्र ऐसा प्रोफेशन है जिसकी आलोचना करने की आजादी सर्वाधिक है। पत्रकारिता इन आलोचना को आत्मसात करता है। मीमांसा करता है और अपने आपको सुधरने का मौका देता है। अपनी गलती मानने में भी पत्रकारिता ने कभी गुरेज नहीं किया तो समाज के कोढ़ को सामने लाने में भी वह सबसे आगे रहा। शायद यही कारण है कि समाज हर पेशे की गलती को व्यवसायिक होने का लिबास पहना कर मुक्त कर देता है किन्तु पत्रकारिता को वह नहीं बख्शता है बल्कि वह गहरे से अपने विरोध दर्ज कराता है। समाज से यहां आशय उस आम आदमी से है जिसकी आशा और निराशा अखबारों से जुड़ी होती है। उसके लिये न्याय का मंच, बहरे कानों तक बात पहुंचाने का माध्यम अखबार ही हैं। ऐेसे में वह चाहता है कि पत्रकारिता और मजबूत हो।
रही बात फिल्म लम्हा में ऐश्वर्या के नाम का इस्तेमाल करने और अमिताभ के नााराज होने की तो यह उनका व्यवसायिक मामला है और इससे फिल्म को लोकप्रियता मिलती है और अमिताभ इतने नासमझ नहीं हैं िकवे ऐसे डायलाग पर ऐतराज करें वह भी तब जब ऐश्वर्या के बहाने मीडिया पर वार किया जा रहा है। एक तीर से दो निशाने लगा है एक तरफ ऐश्वर्या की लोकप्रियता दिखायी गयी है तो दूसरी तरफ मीडिया को ऐश्वर्या के करीब लाकर खड़ा कर दिया गया है। यह एक सुनियोजित ढंंग से मीडिया को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश है। मुझे तो इस बात की खुशी है कि अनुपम खेर जैसा सकरात्मक सोच का अभिनेता ऐसे छोटे डायलाग से अमिताभ से डर रहा है। साथी पंकज क ेलेख के प्रतिक्रियास्वरूप् किसी सज्जन ने रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण दिया है। यह ठीक उदाहरण है और मेरी समझाइश है कि अनुपम खेर रामकृष्ण परमहंस के उदाहरण से कुछ सीख लें, फिर फिल्मों के जरिये आम आदमी को सिखाने और समझाने की कोशिश करें क्योंकि एक डरा हुआ व्यक्ति आम आदमी के डर को भला कैसे और किस तरह दूर

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