मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने न जाने किस झोंक में कह दिया कि "सिंधिया परिवार" ने अंग्रेजों से मिल कर भिण्ड के लोगों पर बहुत ज़ुल्म किये... शायद वे भूल गए कि जिस पार्टी ने उन्हें यहाँ तक पहुँचाया उसकी रक्त मज्जा में राजमाता विजया राजे सिंधिया का खून पसीना लगा है...और तो और उसी सिंधिया परिवार की वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं और खुद उनकी कैबीनेट में यशोधरा राजे मंत्री हैं...!

"रहिमन जिव्हा बावरी कह गयी सरग पतार.." को चरितार्थ कर शिवराज सिंह अब कपाल पर वह सब सह रहे हैं जो रहीम कह गए हैं...लेकिन इससे भी बड़ा लाख टके का सवाल ये है कि आखिर यशोधरा राजे अपनी माँ और अपने कुल का ऐसा अपमान क्यों कर सह रहीं हैं...सिर्फ अखबारों में भावुक इंटरव्यू देकर उनका मन मान गया..? उस पर भी तुर्रा यह कि कह रहीं हैं.. लगता नहीं शिवराज जी ने ऐसा कहा होगा... पता लगाऊंगी क्या कहा था...आदि आदि...!

तो क्या सी आर पी सी की धारा 164 के तहत शिवराज सिंह इकबालिया बयान दर्ज़ कराएँगे कि हाँ यह सब कहा था तब यकीन होगा...? ऑडियो, वीडियो, अखबार ,चैनल सब पर मौज़ूद है वो बयान तो तस्दीक क्या और किस बात की करना है...? आश्चर्य है कि बहुत छोटी छोटी बातों पर अधिकारियों, कर्मचारियों पर बिफर जाने वालीं यशोधरा राजे इतने बड़े अपमान को किन्तु परंतु के साथ जब्त कर जाना चाहतीं हैं...! पहली बार जब मंत्री बनीं थीं तो अपने कुल की प्रतिष्ठा के लिए बाकायदा नोटिफिकेशन जारी करवा कर "श्रीमंत" शब्द तक विधानसभा और सचिवालय तक के शासकीय दस्तावेजों में भी जुड़वा लिया था यशोधरा राजे ने...तो अब क्या हो गया...?

यह तो सर्व विदित ही है कि जनसंघ से लेकर भाजपा तक पार्टी का तरक्की का सफ़र राजमाता विजया राजे सिंधिया के योगदान के बिना एक कदम नहीं चल सकता था...उसी सिंधिया परिवार को उसी पार्टी के मुख्यमंत्री अंग्रेजों के साथ जुल्म करने वाला बता रहे हैं और आप खामोश हैं...!

स्वाभिमान की मूर्ति  राजमाता..

आइये आपको याद दिलाएं कि आपकी माता विजयाराजे स्वाभिमान की रक्षा  के लिए किस हद तक संघर्ष करने वालीं थीं..! राजमाता से लोकमाता तक का मार्ग उन्होंने यूँही तय नहीं किया था..बहुत संघर्ष किया था। इंदिरा गांधी का दौर था..विजयाराजे कांग्रेस में ही थीं।तब राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले पं द्वारिका प्रसाद मिश्र मुख्य मंत्री थे। सन् 1967 के विधानसभा चुनाव से पहले विजयाराजे की पं मिश्र से ठन गयी। मुद्दा ये था कि विजया राजे ग्वालियर चम्बल की सीटों पर अपनी पसंद के लोगों को टिकिट देना चाहतीं थीं लेकिन मिश्र इसके लिए तैयार नहीं थे। बात इंदिरा गांधी तक पहुंची लेकिन उन्होंने भी द्वारिका प्रसाद मिश्र का ही साथ दिया।

राजमाता विजयाराजे ने क्रुद्ध होकर कांग्रेस छोड़ दी और अपने उम्मीदवार हर सीट पर उतार दिए...अधिकांश जीते भी। और, तब द्वारिकाप्रसाद मिश्र को करारी शिकस्त देकर राजमाता ने देश की "पहली गैर कांग्रेसी सरकार" बनवा कर इंदिरा गांधी तक को आइना दिखा दिया...! विजयाराजे ने जीवन की आख़िरी सांस तक कांग्रेस की तरफ पलट कर नहीं देखा... और जनसंघ और भाजपा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन होम कर दिया...!

और जान लीजिये...उस समय राजमाता चाहतीं तो खुद मुख्य मंत्री बन सकतीं थीं लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया तब गोविन्द नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने और 30 जुलाई 1967 से 12 मार्च 1969 तक मुख्यमंत्री रहे।

और माधवराव जैसे स्वाभिमानी भाई..

यशोधरा जी ...क्या आपको याद नहीं कि आप माधवराव सिंधिया जैसे राजीनीति के बिरले, बेदाग़ और स्वाभिमानी व्यक्ति की सगी बहन हैं.. यह तो याद होगा न कि जब पी वी नरसिम्हाराव ने माधवराव सिंधिया का नाम "जैन हवाला डायरी" में लाने का षड़यँत्र रचा तो बिना देर किये उन्होंने न केवल केंद्रीय मंत्री पद बल्कि कांग्रेस तक छोड़ दी थी..अपने पर लगे आरोप से बेदाग़ निकल कर ही माधवराव सिंधिया ने चैन की सांस ली...अपनी पार्टी बनाई और ऐतिहासिक वोटों से जीत कर सीना तान फिर संसद पहुंचे...

अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग देने वाली विजय राजे की बेटी और माधव राव की बहन होने का गौरव क्या आपको जरा भी प्रेरणा नहीं देता...? पार्टी और सरकार में लगातार हो रही उपेक्षा और अब आपके कुल वंश पर ही जुल्म और सितम के आरोप आपके ही नेता लगा रहे हैं तब भी क्या आत्मा कचोटती नहीं....? अगर मंत्री पद और लाल बत्ती आपके मान सम्मान से बड़ा है... तो आपसे कुछ नहीं कहना...!

सन् 1857 के विद्रोह में सिंधिया परिवार की भूमिका पर फैले अर्द्ध सत्य और कोरी कल्पनाओं पर फिर कभी...इतिहास के प्रामाणिक तथ्य और तर्क के साथ। बस इतना याद रखिये कि कविता में शामिल एक पंक्ति "इतिहास" नहीं होती.

लेखक डा. राकेश पाठक वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं.