वैसे तो आस्था इतिहास एवं कानून की जटिलताओं में दीर्घकाल से जकड़ी अयोघ्या नगरी के लिए 30 सितंबर 2010 का दिन स्वतंत्रता दिवस के समान साबित हो सकता था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपना फैसला सुनाकर वह रोशनी दिखाने का प्रयास किया था, जो सम्पूर्ण राष्ट्र को अतीत के अन्धेरे से बाहर निकाल सकती थी। मालूम हो कि भारत के इतिहास में अयोध्या का यह मामला पिछले 500 - 600 वर्षो से धार्मिक विवादों में फंसा है एवं गत 67 वर्षो से न्यायालय में चल रहा है। देखा जाए तो यह समय अपने आप में राम के वनवास से भी काफी लम्बा है। साल 2010 से उच्चतम न्यायालय में लंबित पड़ा ये मामला एक बार फिर फ़रवरी 2016 में सुब्रमण्यम स्वामी के इस विवाद को लेकर काफी सक्रिय हो जाने के बाद  मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गया था।

विदित है कि वर्ष 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीयं जनता को अपने निर्णय के द्वारा विवादित जमीन का एक तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़ा समिति को, एक तिहाई हिस्सा राम लल्ला विराजमान अर्थात भगवान राम की मूर्ति के लिए तथा एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक़्फ बोर्ड को देने का निर्णय किया था। न्यायालय के निर्णय द्वारा जमीन का बटंवारा होता या नहीं परन्तु भारत को जोड़ने का एक सुनहरा अवसर अवश्य ही प्राप्त हो जाता। अर्थात यदि दोनों मुख्य पक्ष चाहते तो भारत अपने आपको 6 दिसंबर 1992 के बाद सही मायने में बदल सकता था और अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति का जीवंत संदेश पूरे विश्व को विवादित स्थल पर मंदिर एवं मस्जिद एक साथ बनवा कर दे सकते हैं। मथुरा एवं बनारस में इसका शानदार उदाहरण देखा जा सकता हैं जहां मंदिर एवं मस्जिद साथ-साथ हैं। इन स्थानों में आरती एवं अज़ान भी एक ही समय में होती है। बाबरी मस्जिद के वर्तमान पक्षकार इकबाल अंसारी (स्वर्गीय हाशिम अंसारी के पुत्र) का भी कहना है कि विवादित ज़मीन में राम मंदिर और मस्जिद का निर्माण किया जा सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इसी आधार पर फैसला सुनाया था। इस मामले में नए राजनीतिक विवाद पैदा करने की कोशिशें एक बड़ी भूल साबित होगी।

मगर दुर्भाग्यवश ये विवाद 60 वर्षो बाद आये इस संतुलित एवं स्वागतयोग्य निर्णय के बाद पुनः सर्वोच्च न्यायालय जा पहुंचा जहां इसके पुनः सात वर्ष होने वाले है और अगर ये विवाद अब भी आपसी बातचीत से नहीं हल हुआ तो भविष्य में उच्चतम न्यायालय का क्या निर्णय एवं किसके पक्ष में आयेगा?  जैसी बातों की दुविधा में ना जाने कितनी सदियां और लगे, इसकी भविष्यवाणी दोनों में से कोई भी पक्ष भी नहीं कर सकता। इस विवाद का हल अंतत: बातचीत से ही संभव मालूम पड़ता है। यानि दोनों पक्षों की आपसी सहमति एवं समझदारी द्वारा ही संभव हो सकता हैं इसलिए इस विवाद को भविष्य के कंधो पर लादना भावी पीढ़ी के साथ अन्याय एवं भविष्य की भारी भूल सिद्ध हो सकती है। जो की विश्व के साथ कदमताल मिलाकर दौड़ने को तैयार है।

गौरतलब है कि हाईकोर्ट के निर्णय ने विवादित जमीन को 2:1 के हिसाब से विभाजित किया था। जिसमें मस्जिद पक्ष के सर्मथकों को आंशिक रूप से निराशा हाथ लगी थी, ऐसा मुस्लिम पक्ष के कुछ लोगों का मानना है। कुछ हिन्दु संगठन भी उच्च न्यायालय के निर्णय से संतुष्ट मालूम नहीं पड़ते थे,  जिसके लिए दोनों ही पक्षों के पास अपने-अपने कई कारण एवं तर्क हो सकते हैं मगर क्या वो सभी कारण एवं तर्क देश की एकता एवं अखंडता को बचाए रखने तथा देश को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर में मजबूती प्रदान करने से ज्यादा शक्तिशाली हो सकते हैं ? क्योंकि आज का भारत 1992 का भारत नहीं है। आज के युवा जानते हैं कि उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं अच्छे स्वास्थ्य की आवश्यकता मंदिर एवं मस्जिद से कहीं ज्यादा है। लेकिन उसके लिए स्कूल कॉलेज एवं अस्पतालों की संख्या दुर्भाग्यवश मंदिर एवं मस्जिद की तुलना में काफी न्यूनतम संख्या में हैं, जिसके लिए शायद ही किसी राजनीतिक दल या फिर किसी धर्म विशेष ने कभी कोई आंदोलन किया हो। आज मसला ये नहीं कि किस पक्ष की हार होगी और किसकी जीत।  बल्कि ये देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि भारत हारा या जीता। इस अतिसंवेदनशील मसलें पर पूरे विश्व की नजरें हमारे देश पर लगी हुई हैं जो की भारत के भविष्य के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

शायद इस वजह से ही 31 मार्च 2017 को उच्चतम न्यायालय ने भी इस मामले की सुनवाई करते हुए सुब्रमण्यम स्वामी को पक्षकार मानने से इनकार कर दिया है। माननीय उच्चतम न्यायालय इस मामले में जल्द सुनवाई संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले में दोनों पक्षकारों को और समय देने की जरुरत है।

इस पूरे विषय में दोनों पक्षों के लोगों के अलावा अन्य धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों और मीडिया की संतुलित एवं सकारात्मक रिर्पोटिंग भी अपेक्षित हैं। भारत में मर्यादापुरूषोतम के नाम पर मर्यादा का उल्लंघन हो, भारत का किसान आत्महत्या करें और हम मंदिर-मस्जिद के लिए झगड़ते रहे ये बात स्वयं राम को भी बुरी लगेगी। अब देश को इस पर विचार करना ही होगा ताकि इस वर्ष दीपावली में जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उनके वनवास के साथ-साथ अयोध्या को भी उसके वनवास से मुक्ति मिल चुका हो।

विवाद - राजनीति = समाधान

विकाश ऋषि
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