अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के नतीजे अप्रत्याशित थे या फिर यह मोदी मैजिक? जिस ‘शख्स को मीडिया से लेकर राजनैतिक पंडित तक कमतर आंक रहे थे उसका क्रेज आज तक बरकरार है। 2014 में बीजेपी गठबंधन ने 73 लोकसभा क्षेत्र में विजय हासिल की थी जबकि विधान सभा बार यह गठबंधन 337 विधान सभा क्षेत्रों में आगे रहा था। यही इतिहास तीन वर्षों के बाद 2017 में भी दोहराया गया। बीजेपी गठबंधन को 325 सीट पर जीत मिली। 2014 में सपा को 05 सीटों पर फतेह हासिल हुई थी और 42 विधान सभा वार 42 सीटों पर उसके प्रत्याशी आगे रहे थे। विधान सभा चुनाव में भी सपा इसी आंकड़े के इर्दगिर्द नजर आई। उसे मात्र 47 सीटें मिली, जबकि बसपा और कांग्रेस की स्थिति 2014 के मुकाबले और भी दयनीय हो गई।

ऐसे में लाख टके का यही सवाल है कि क्या 2014 से लेकर 2017 तक बीजेपी के लिये कुछ नहीं बदला जबकि 2014 के बाद सपा-बसपा और कांग्रेस ज्यादा आक्रमक हो गई थीं। नोटबंदी, आरक्षण, दलित उत्पीड़न, तीन तलाक, सूटबूट की सरकार, केन्द्र सरकार की कथित नाकामी, असहिषुणता आदि के सहारे बीजेपी को कटघरे में खड़ा करने की पूरी कोशिश की गई, लेकिन मतदाताओं ने विरोधियों की बजाये मोदी पर ज्यादा भरोसा किया। उनमें मोदी की बातों पर भरोसा दिखा तो केन्द्र के कामकाज को भी सराहा गया।

इस चुनाव से यह भी साबित हो गया कि मोदी सरकार पूंजीपतियों की नहीं गरीबों की सरकार है। दरअसल, मोदी का काम करने का तरीका इतना अलग था कि विरोधी इसकी थाह ही नहीं पा सके। शौचालय और स्वच्छ भारत अभियान को कोई प्रधानमंत्री अपना लक्ष्य बनाता है तो यह चौंकाने वाली बात है। देश के इतिहास में किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं किया होगा। इसी प्रकार सूटबूट की सरकार का दाग भी मोदी ने अपने कार्यशैली से धो दिया। मोदी ने कोई बहुत बड़ा कारनामा नहीं किया, लेकिन जो किया उसमें काफी सुदृढ़ता दिखी। चाहे उज्जवला योजना के तहत गांव-देहात से लेकर शहरों तक की गरीब महिलाओं को मामूली कीमत पर गैस के सेलेंडर बांटने की बात हो या फिर गरीबों के घरों में बिजली पहुंचाने का काम मोदी ने इसे काफी गंभीरता से आगे बढ़ाया। गरीब परिवारों के लिये पहले जनधन खाता खुलवाना उसके बाद उनके घरों तक बिजली-गैस कनेक्शन, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का पहुंचाना, मोदी की जीत में टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ तो प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था और नोटबंदी का ढिंढोरा पीटकर मोदी ने मध्य वर्ग के मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित किया।

तमाम किन्तु-परंतुओं के साथ इंकार इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह जीत बीजेपी की नहीं मोदी की है। मोदी ने जिस तरह से प्रचार किया, वह देखने लायक तो था ही समझने वाला भी था। मोदी जहां भी जनसभा करते वहां वह अपना भाषण टुकड़ों में बांट कर आगे बढ़ाते थे। सबसे पहले वह अखिलेश सरकार की नाकामी गिनाते, अखिलेश-राहुल पर तंज कसते, उनकी दोस्ती पर सवाल खड़ा करते, इसके बाद जनता को यह बताते कि अखिलेश सरकार को क्या करना चाहिए था जो उसने नहीं किया। फिर यह बताते कि दिल्ली यूपी को खूब पैसा दे रही है, लेकिन अखिलेश सरकार सियासत के तहत केन्द्र की कल्याणकारी योजनाओं में अड़गेबाजी लगा रही है।

हवा का रूख भांप कर मोदी पहले चरण से लेकर आखिरी चरण तक में अपने भाषण में लगातार बदलाव करते रहे। इसके साथ-साथ वह बसपा के दलित-मुस्लिम और सपा गठबंधन के यादव-मुस्लिम को धाराशाही कर दिया। मुस्लिम बीजेपी के साथ आयेंगे नहीं, इसलिये मोदी ने बसपा के वोट बैंक समझे जाने वाले दलितों और सपा के पिछड़ा वोट बैक में सेंधमारी का रास्ता चुना। मोदी ने कुछ ऐसा माहौल बनाया जिससे हिन्दुओं को दलित, अगड़ा-पिछड़ा में बांट कर मुस्लिम वोटों के सहारे सत्ता का स्वाद चखने वाले सपा-बसपा पूरी तरह से एक्सपोज हो गये। बीजेपी ने यूपी की जंग को हिन्दू बनाम मुस्लिम में बांट दिया। जिसके चलते मुसलमानों के सहारे सत्ता की सीढ़िया चढ़ने का सपना देख रहे सपा गठबंधन और बसपा के नेताओं की सियासत औधे मुंह गिर पड़ी। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी द्वारा उठाया गया कब्रिस्तान और शमशाम का मुद्दा इस कड़ी में अहम पड़ाव साबित हुआ।

उक्त तमाम बातों के अलावा मोदी के पक्ष में जर्बदस्त माहौल बनने का एक कारण सपा-कांग्रेस गठबंधन के अनुभवहीन नेताओं की मौजूदगी भी रही। मुलायम किनारे चले गये थे, सत्ता के नशे में चूर अखिलेश ने पिता ही नहीं पार्टी के अन्य दिग्गज नेताओं को भी हासिये पर डाल दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अखिलेश, बीजेपी और मोदी के तरकश से निकले तीरों की काट नहीं कर सके और गधों का प्रचार जैसी बातें करने लगे, जिसे मोदी ने खूब भुनाया। यह कहने में कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी कि सपा-कांग्रेस गठबंधन के स्लोगन, ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ और ‘काम बोलता है' पर मोदी का जुमला ‘काम नहीं, कारनामें बोलते हैं' ज्यादा भारी पड़ा। ऐसा लग रहा था, बसपा सुप्रीमों मायावती के पास कोई मुद्दा ही नहीं रह गया था। वह मुसलमान, नोटबंदी और आरक्षण से ऊपर उबर ही नहीं पाईं। बिहार चुनाव में लालू यादव बीजेपी के खिलाफ आरक्षण को हथियार बनाने में कामयाब रहे थे, माया को लग रहा था, आरक्षण का मुद्दा गरमा कर वह भी सियासी फायदा ले सकती हैं।

सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा को हार से सबक लेना चाहिए था, लेकिन सबक लेने की बजाये दोंनो ही दलों के नेता ईवीएम पर सवाल खड़े करते और मतदाताओं पर प्रश्न चिंह लगाते रहे। हार के बाद अखिलेश का विकास को लेकर अपनी पीठ थपथपाना और जनता को उलाहना देना किसी भी तरीके से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता है। अखिलेश कुछ भी कह रहे हों, लेकिन जब हार के लिये पार्टी के भीतर से उनके ही सिर पर ठीकरा फोड़ा जा रहा हो तो उनके लिये आगे की राह आसान नहीं कहा जा सकता है। चचा शिवपाल यादव तो नतीजे आने के बाद से ही भतीजे अखिलेश पर तंज कस रहे हैं।

बसपा सुप्रीमों मायावती तो ईवीएम मशीन में गड़बड़ी की बात करके बीजेपी की जीत को ही नकार रही हैं। बात यहीं तक सीमित नहीं है जो मायावती चुनाव प्रचार के दौरान कहती फिर रही थीं कि बीजेपी जीतेगी तो आरक्षण खत्म कर देगी, वह ही मायावती अब कह रही हैं कि अभी नहीं 2019 में बीजेपी जीतेगी तो उसके बाद आरक्षण खत्म कर देगी। शायद, बसपा सुप्रीमों को पता नहीं है कि वह इस तरह की बातें करके हंसी का पात्र बन रही हैं।

बहरहाल, पांच राज्यों में हुए चुनाव में मोदी का ढंका बजने से देश में ही नहीं चीन-पाकिस्तान सहित तमाम देशों तक में गजब की प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इधर हिन्दुस्तान में मोदी के पक्ष में नतीजे आये और लोग केसरिया होली खेलने लगे तो तो उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने देश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं के साथ होली मनाने पहुंच गये। चीन का मीडिया भी अब कहने लगा है कि मोदी की बढ़ती ताकत चीन के लिये खतरे की घंटी है। इस जीत के बाद मोदी चीन को लेकर ज्यादा कठोर नजर आ सकते हैं। इतना ही नहीं, चीन की मीडिया ने तो 2019 में मोदी की जीत की भविष्यवाणी तक कर दी है।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.