अपराधिक प्रवत्ति के बाप-बेटी के कारनामों की मोटी फाइल मेरे हाथ लग गई है। अब वो हर पैंतरा अपना रहे ताकि मैं FIR न करुं। कल थाने बुलाया आपस में मामला समझने। अच्छा मजे की बात यह कि फोन उन्होंने थाने के हवलदार से करवाया। मैं पहुंचा तो उनका वकील बाहर ही बात करने लगा। सुलह कर लीजिये। यहीँ मामला देख लेते हैं। और भी कई तरह के लुभावने ऑफर। मैंने बोला विचार करके बताऊंगा और मैं गाड़ी चालू करने लगा। तो उनका वकील बोला चलिये घर में बैठकर बात करेंगे। हवलदार साहब को भी ले चलते हैं। मेरे घर से चंद कदमों की दूरी पर है थाना लेकिन बदनीयत का मुझे पूरा अंदाजा था। फिर भी मेरी आदत है पहला वार दुश्मन को ही करने देता हूं।

करीब आधे घण्टे चर्चा हुई थी कि खुद को वकील बताने वाला कोई शुक्ला भी आ गया। फिर थोड़ी देर बाद हवलदार चला गया। उसके बाद वकील साहब के स्वर बदल गये। सुन... समझदारी से रह। बात समझ। मैं एक ही बार समझाता हूं। बहुत तरीके हैं मेरे पास समझाने के। अभी तक उसकी बातों से मैं समझ गया था ये मुर्गे-दारु के लिए किसी पर भी भौंकने वाले कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं।

इतने में कुछ बाईक और 1 कार आ गईं। 5-6 काले कुत्ते और आ गये। शराब, गुटका खाते। करीब 1 घण्टे तक उन्होंने अपना पूरा रस निकाल लिया। किसी ने मेरी फोटो खींच ली। किसी ने मेरे जिम का पता पूछ लिया और किसी ने उस जगह का जहां से मैं खाना लाता हूं। जब उनका पूरा तेल निकल गया और मुझे कोई फर्क ही नहीं पड़ा तो गाली बकते हुये भाग गये। लेकिन उनको देखकर जहन में सवाल आया कि जबलपुर में वकालत का धंधा इतना मन्दा है कि कुछ सड़क छाप वकील गुंडे बने घूम रहे हैं? क्योंकि जबलपुर में एक यूनिवर्सिटी है जो हर साल वकीलों की खेप निकाल रही है। अब जो काबिल हैं वो नामी भी हैं। बाकी तो जिसने दारु पिला दी वही बाप है।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
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