अजय कुमार, लखनऊ

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के भय से हिन्दुस्तान का मुसलमान कभी उबर नहीं पाया। चुनाव के समय यह भय और भी विकराल रूप धारण कर लेता है। यह भी कहा जा सकता है कि बीजेपी विरोधी दलों ने वोट बैंक की सियासत के चलते सोची-समझी रणनीति के तहत मुसलमानों को कभी बीजेपी के करीब आने नहीं दिया। भाजपा के इसी कथित भय  के चलते मुसलमानों को इसका खामियाजा भी कम नहीं उठाना पड़ा है। मुसलमानों की तरक्की के रास्ते ही संक्रीण नहीं हो गये, इसका उनकी सोच पर भी असर पड़ा। बीजेपी से भयभीत मुसलमानों का आज तक न तो कांग्रेस कोई भला कर पाई है और न ही सपा-बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों ने कुछ ऐसा किया है जिससे हिन्दुस्तान के मुसलमानों का उद्धार हुआ हो। फिर भी मुसलमान इन दलों के पीछे हाथ बांधे खड़ा रहता है। मुसलमानों के पास बीजेपी के विरोध में कहने के लिये उतना नहीं है जितना की वह उससे भयभीत रहते हैं। इसकी वजह है तरक्की का अभाव। शिक्षा और जागरूकता की कमी।

शायद इसी वजह से समाजवादी पार्टी के झगड़ें ने मुसलमानों को अंदर तक हिला कर रख दिया है,उन्हें चिंता इस बात की नहीं है कि सपा में झगड़ा किस बात को लेकर हो रहा है। चिंता है तो यह कि कहीं सपा के कमजोर होने के चलते बीजेपी मजबूत न हो जाये। उनका वोट बंट न जाये। यह सब इस लिये हो रहा है क्योंकि शिक्षा के अभाव में मुसलमानों की बड़ी आबादी अपनी सोच से अधिक भरोसा सुनी-सुनाई और मनगढंत अफवाहों और बातों पर करता है। इसी लिये जहों हिन्दुओं के बीच से सती प्रथा,चार-चार शादियां करने जैसी बुर्राइंया तो दशकों पहले समाप्त हो चुकी हैं,लेकिन तीन तलाक और चार बीबियांे जैसी कुरीतियों से मुसलमानों को छुटकारा नहीं मिल पाया हैं। ऐसा नहीं है कि इस्लाम में कोई कमी है, लेकिन कई मौकों पर इस्लाम के सिद्धांतों की व्याख्या ही जब गलत कर दी जाती हो तो कम जानकारी रखने वाले मुसलमान तो दूर इस्लाम के बड़े से बड़े धुरंधर भी बहक जाते हैं। यह और बात है कि सयम के साथ अब मुसलमान भी बदलने लगा है,लेकिन इसकी रफ्तार काफी धीमी है।

इसी भय के चलते विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में छिड़े घमासान से मुसलमान उलझन में है। मुलायम-अखिलेश के बीच खिंची तलवारें, कांग्रेस से गठबंधन की चर्चा जैसे मुद्दे मुस्लिमों में भ्रम पैदा कर रहे है। इस पर मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरूओं की अलग-अलग सोच मुलसमानों को और भीं भ्रमित कर रही है। वोटों के ठेकेदार कहते हैं कि सपा का झगड़ा नहीं सुलझा तो मुस्लिम वोटर बिखराव के शिकार हो सकते है। कुछ वोट बसपा के खातें मेें जा सकते हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में मुसलमान वोटों के सहारे ही समाजवादी पार्टी सत्ता मंे आई थी मगर इस बार चुनाव आते-आते पार्टी खुद मुलायम सिंह यादव के बीच बंटकर रह गई है। सपा के दोनों खेमें जहां मुस्लिमों पर नजर जमाए है, वहीं बसपा और कांग्रेस समेंत दूसरे ऐसे भी दल भी मुसलमानों पर डोरें डालने में कोई कसर नही छोड़ रहे है। अब तो ओबैसी की पार्टी भी मैदान में कूद पड़ी है। पश्चिमी यूपी की बात करें तो यहां की तमाम सीटों परर मुस्लिमों निर्णायक साबित होते है। सियासी जानकार का कहना है। कि अगर कांग्रेस-सपा और राष्ट्रीय लोकदल एक छतरी के नीचे आ जाते हैं तो मुसलमानों की राह थोड़ी आसान हो सकती है। मगर भ्रम की स्थिति से मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर सपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस समय मुस्लिम समाज में भी बहस जोर पकड़ रही है कि उनकी राह क्या होनी चाहिए। समाज के बुद्धिजीवी, धर्मगुरू, राजनीतिज्ञ और यहां तक सियासी से बहसों से दूर रहने वाले आम लोग भी वोट की चर्चा में शामिल नजर आ रहे है। यूपी में करीब 150 विधान सभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

उधर, समाजवादी पार्टी में बंटवारे को लेकर इत्तेहादे मिल्लत कौंसिल के मुखिया मौलाना तौकीर रजा खां कहते हैं कि मुसलमानों ने हमेशा मजलूमों का साथ दिया है। हमारी नजर में इस समय मुलायम मजलूम हैं और बहुत कमजोर होते नजर आ रहे है। जररूत पड़ी तो हम उनके लिए देवबंद जाने से भी गुरेज नहीं करेंगे। चुनाव अहम मुद्दा है, और मुझे फतवों से डर नही लगता। मौलाना का कहना था मिल्लत कौंसिल यूपी के सभी छोटे दलों को मुलायम के समर्थन में एकजुट करने की कवायद में जुटी है। मुलायम ने पिता का पूरा फर्ज निभाया पर मुख्यमंत्री अखिलेश राजनीतिक फायदे के लिए उनके खिलाफ खड़े हो गये है। यह और बात है कि तौकीर रजा जैसे सोच सभी मुस्लिम धर्मगुरूओं की नहीं है। अखिलेश के साथ खड़े होने वाले धर्मगुरूओं की भी कमी नहीं है।
 
लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.