अजय कुमार, लखनऊ
समाजवादी पार्टी का पारिवारिक विवाद क्या थमा, बसपा सुप्रीमों मायवाती की दिल की धड़कन बढ़ गई। सपा में कलह का फायदा उठाकर और बीजेपी का डर दिखा कर मुसलमानों को अपने पाले में खींचने का अभियान चलाये हुए मायावती को जैसे ही इस बात का अहसास हुआ कि सपा उसकी मुस्लिम वोट बैंक की सियासत में रंग में भंग डालने वाला है तो वह मुस्लिम वोटों के लिए अपनी रणनीति को और भी खूबसूरती के साथ अमलीजामा पहनाने में जुट गई है। मुसलमान वोटर सपा से दूरी बनाये रखें इसके लिये बसपा ने एक पुस्तिका तक प्रकाशित करा दी है। इस पुस्तिका के माध्यम से बसपा की तरफ से 2017 के लिए जो रणनीति तैयार की जा रही है उसमें मुसलमानों को यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि है कि वे जिस समाजवादी पार्टी को अब तक अपना सबसे बड़ा हितैषी समझकर वोट करते रहे हैं, दरअसल, वह उनकी सबसे बड़ी दुश्मन है? उसने मुसलमानों का बहुत नुकसान किया है। इसकी वजह से बीजेपी कितनी मजबूत हुई है, यह बताने के लिये बसपा ने ‘मुस्लिम समाज का सच्चा हितैषी कौन, फैसला आप खुद करें’ शीर्षक से यह पुस्तिका तैयार की है।

इस पुस्तिका को हर मुस्लिम मतदाता तक पहुंचाने की योजना है। पुस्तिका हिंदी-उर्दू दोनों में हैं। बसपा सुप्रीमों इस पुस्तिका के माध्यम से यह प्रचारित करना चाहती हैं कि मुसलमान सच से वाकिफ हों, भावनाओं में मत बहें। अगर एसपी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव यह कहते हैं कि उन्होंने बाबरी मस्जिद बचाने के लिए अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाई थी, तो इससे मुसलमानों को खुश होने की जरूरत नहीं है। इस तरह के बयानों से मुसलमानों को कोई फायदा होने वाला नहीं है, उलटा इससे धार्मिक आधार पर होने वाले ध्रुवीकरण से बीजेपी को ही फायदा होगा।’

पुस्तिका में सपा प्रमुख मुलायम सिंह की सियासत को लेकर कुछ सवाल भी खड़े किये गये हैं। जैसे पुस्तिका में कहा गया है कि बिहार में मोदी को हराने के लिए जब नीतीश-लालू ने महागठबंधन बनाया था, तो उसमें सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की भी भागेदारी थी, लेकिन चुनाव के से कुछ दिनों पूर्व  मोदी के दबाव में आकर वह इस गठबंधन से अलग हो गए थे। सवाल खड़ा किया गया है कि क्या इससे मुलायम की  बीजेपी से मिलीभगत साबित  नहीं होती ? पुस्तिका में कहा गया है कि मुसलमानों ने अपना कीमती वोट देकर 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनवाई थी। तबसे अब तक यूपी में मुजफ्फरनगर सहित 400 छोटे-बड़े सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं, जिनमें मुसलमानों का सबसे ज्यादा जान-माल का नुकसान हुआ। क्या समाजवादी सरकार मुसलमानों को उनके अहसानों की कीमत दे रही है?

पुस्तिका में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सपा प्रमुख मुलायम सिंह एक दूसरे की खूब तारीफ करते हैं। पीएम मोदी सपा प्रमूुख मुलायम सिंह यादव के परिवार मंे होने वाले सभी मांगलिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते  हैं। ऐसे समारोहों में जब मोदी और दूसरे बीजेपी नेता मुलायम परिवार के साथ मंचासीन होते हैं तो समाजवादी पार्टी के मुस्लिम मंत्रियों और नेताओं को मंच पर जाने की इजाजत क्यों नहीं होती? पुस्तिका में कहा गया है कि समाजवादी पार्टी को बताना होगा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में दोषी ठहराए जाने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को पार्टी में क्यों शामिल किया गया था। आगरा में पार्टी के सम्मेलन में कल्याण को लाल टोपी किसने और क्यों पहनाई थी? इसमें कहा गया है कि  सपा नेता मुसलमानों को इस बात का जवाब दे कि बाबरी मस्जिद पर पहला फावड़ा चलाने वाले साक्षी महाराज को क्यों राज्यसभा भेजकर सम्मानित किया गया?

सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के अतीत को खंगालते हुए लिखा गया है कि 1967 मुलायम सिंह में जब पहली बार जसवंतनगर से विधायक बने थे तो जनसंघ की मदद से बने थे। 1977 में बनी सरकार में भी मुलायम सिंह और जनसंघ के लोग शामिल थे। 2009 में जब लोकसभा के चुनाव हुए तो यूपी में बसपा की सरकार थी। उस वक्त बीजेपी को 80 में से सिर्फ नौ सीटों पर जीत मिली। 2014 में जब यूपी में एसपी की सरकार थी तो बीजेपी को 73 सीटें मिल गईं। इसी प्रकार 1995 में सपा की बीजेपी के साथ साझा सरकार बनी थी, उसी दौरान वीएचपी, आरएसएस के लोगों ने काशी में जलाभिषेक और मथुरा में यज्ञ का ऐलान किया, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने बीजेपी को दबाव में आए बगैर इसे नही होने दिया। इसी तरह के अन्य बिन्दुओं को भी उठाया गया है जिससे सपा-भाजपा के बीच निकटता उजागर होती है।

दरअसल, 2007 में उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती दलित-मुस्लिम गठजोड़ की सियासत से सत्ता का मजा चख चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में लगभग 18 प्रतिशत मुसलमान हैं और 23 प्रतिशत दलित हैं। बसपा सुप्रीमों को लगता है कि अगर दलितों के साथ मुस्लिमों का बड़ा हिस्सा साथ आ जाए तो फिर उसकी सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता। गौरतलब हो अयोध्या में विवादित ढांचा गिराये जाने से पूर्व तक राज्य में मुस्लिम वोटर पूरी तरह से कांग्रेस के साथ हुआ करते थे, लेकिन 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के उभार और फिर दिसंबर 92 में अयोध्या स्थित विवादित स्थल के ढहने के बाद सारे समीकरण बदल गए। मुलसमानों की नाराजगी का सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने पूरा फायदा उठाया।

बताते चलें कि अयोध्या कांड के लिये मुसलमानों ने जितना कसूरवार बीजेपी को माना उससे कम कांग्रेस को भी नहीं माना। इसके बाद हुए  दो चुनावों में मुस्लिमों ने सिर्फ सपा को वोट किया, लेकिन बाद के चुनावों में मुसलमान उस प्रत्याशी को वोट करने लगा जो बीजेपी को हरा सकता था। तब मुस्लिम वोट बसपा को भी मिलने लगे, लेकिन मुसलामनों की पहली प्रथमिकता मुलायम सिंह ही हुआ करते थे, जबकि बसपा को लेकर मुसलमानों में विश्वास का संकट बना रहता था। इस बार बसपा का दावा है कि भाजपा  से उसकी दोस्ती नहीं हो सकती। मुसलमानों को लुभाने के लिये ही बसपा ने बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। तलाक जैसे मुद्दो पर वह खुल कर मुसलानों का साथ दे रही हैं। वर्तमान में सपा के 41 और बसपा में 15 मुस्लिम विधायक है। अब देखना यह है कि बसपा सुप्रीमों मायावती का सपा प्रमुख पर किताबी हमला कितना कारगर रहता है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.