समय-समय पर राजनीति हमें एक से बढ़कर एक मुद्दा देती है चाहे वह नोटबंदी का हो, चाहे सर्जिकल स्टाइक का हो। और पत्रकार साथी भी आम लोगों के समान इन मुद्दों पर उलझकर रह जाते हैं। लेकिन मुख्य समस्या ये नहीं बेरोजगारी है। कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो आंखें खुली की खुली रह जाएगी।  दरअसल आगामी 10 वर्षों में देश की आधी से अधिक आबादी बूढ़ी हो जाएगी। यही समस्या अन्य देशों के साथ आने वाली है जिसमें चीन, जापान, डेनमार्क जैसी विकसित देश शामिल हैं। अब इसका असर यह होगा कि भविष्य में भारत के पास लगभग 35 प्रतिशत आबादी ही युवा होगी। जिसमें 10 प्रतिशत युवा विभिन्न वजहों से रोजगार नहीं करते। (हालांकि यह आंकड़ा वर्तमान में 50 प्रतिशत है अर्थात् 50 प्रतिशत युवा रोजगार से नहीं जुड़ पाते)।

अब बचे 25 प्रतिशत युवा। चूंकि विकसित देश भविष्य में युवाओं के लिए अपने द्वार खोल सकते हैं। और उनकी यही प्राथमिकता होगी कि युवा आए और नागरिकता लें। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान भारत को होगा। और 15 से 20 प्रतिशत युवा विदेश चले जाएंगे। अब बचे 5 से 10 प्रतिशत युवा। जिनके कंधों पर 90 से 95 प्रतिशत देशवासियों का बोझ होगा। इनके कंधों पर ही देश की अर्थव्यवस्था की बागडोर होगी। तो भूखमरी, देश की अर्थव्यवस्था, बुजुर्गांे के पेंशन, चिकित्सा व्यवस्था कैसे होगी इसका बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है।

वर्तमान परिपेक्ष
वर्तमान में भी स्थिति भयावह हैं। देश में कुल 20 करोड़ लोग रोजगार धारी हैं। जिसमें सरकारी-प्राइवेट, ठेला-खुमचा व्यापारी सब शामिल हैं। मोदी सरकार आने के बाद एक करोड़ लोग बेरोजगार हुए। हालांकि इसमें अधिकांश का कारोबार दो नंबरी था। तो साढ़े 18 करोड़ लोगों के कंधे पर सवा अरब जनसंख्या का भार हैं। इसमें युवाओं की भागीदारी 8 से 10 करोड़ ही हैं। और यही हाल रहा तो आगामी दस सालों में यह संख्या 4 से 5 करोड़ रह सकती है। 

क्या है सरकार की जिम्मेदारी?
सामान्यत: देशवासियों की मानसिकता है कि रोजगार उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। जिससे लोग अपने हक की मांग नहीं कर पाते। जबकि मौलिक अधिकार जीवन के अधिकार में आजीविका का अधिकार जुड़ा हुआ है। जिसके तहत सभी को रोजगार उपलब्ध कराना, भोजन उपलब्ध कराना, चिकित्सा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। जीवन के प्रत्याशा के तहत सरकार आम नागरिकों से यह वादा करती है कि लोगों को (प्राकृतिक आपदा को छोड़कर) किसी भी हालात में भूख एवं बीमारी से मरने नहीं दिया जाएगा। और 65 वर्ष तक के आयु की जिम्मेदारी जीवन के प्रत्याशा के तहत सरकार लेती है। 

चूंकि सरकार का एक ही काम होता है कि देशवासियों की मांग के अनुसार भविष्य की प्लानिंग करें। भारत में भी प्लानिंग की जाती है लेकिन देशवासियों की नहीं अपिंतु राजस्व की। सरकार लगभग 35 मदों में खर्च करती है और 25 मदों से राजस्व प्राप्ति करती है। इसमें पाई-पाई का हिसाब होता है पैसा कैसे और कहां खर्च होगा कहां से मिलेगा। इसकी पूरी प्लानिंग सरकार के पास होती है। (इसका ब्यौरा कोषालय विभाग से मिलता है)। खर्च के मुकाबले वसूली इसलिए कम रखी जाती है जिससे आम नागरिकों के बीच पैसे की उपलब्धता बनी रही।

ये कैसी प्लानिंग?
सरकारी की प्लानिंग बनियावाद से कम नहीं है। हाउसिंग बोर्ड घर बनाती है लेकिन बेचने के लिए. बेघरों को घर देने के लिए नहीं। रोजगार कार्यालय पंजीयन कर बेरोजगारों को भूल जाता है। खाद्य विभाग यह प्रयास करता है कि कम से कम लोगों को खाद्य सुरक्षा का लाभ मिले। सामाजिक कल्याण विभाग यह प्रयास करता है कि कम से कम लोगों को पेंशन मिले। श्रम विभाग अधिकांशत: श्रमकानूनों की आड़ में कंपनियों से वसूली का धंधा चलाता है उसे यह भी पता नहीं होता कि कहां कितने श्रमिक और कौन-कौन काम कर रहे हैं।

विदेशी और भारतीय प्लानिंग
विदेशों में बच्चा जन्म लेते ही सरकारी संपत्ति मानी जाती है। और सरकार उसका ग्रीन कार्ड बनाकर एक बड़ी राशि उनके नाम पर माता-पिता को जारी करती है। जिससे बच्चे का अच्छा पालन पोषण हो सके। फिर बच्चे के शिक्षा की प्लानिंग सरकार करती है कि कैसे शिक्षा जी जाए। बच्चा जब शिक्षित हो जाता है तो रोजगार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार की होती है। जापान में तो रोजगार उपलब्ध कराने के लिए पुरानी बिल्डिंग को तोड़कर फिर उसे बनवाया जाता है। जब तक लोगों को रोजगार नहीं मिलता तब तक बेरोजगारी भत्ता और सरकारी सुविधाएं मुफ्त में मिलती है जिसमें आवास, बिजली पानी आदि शामिल हैं। भारत में बात करें तो बच्चे के जन्म लेने के बाद आंगनबाड़ी से भोजन मिलता है लेकिन कैसा मिलता है इसकी व्यख्या करने की जरूरत नहीं। आरटीई के तहत शिक्षा मिलती है लेकिन कैसे मिलती है सबको पता है। शिक्षित होने के बाद रोजगार तभी मिलेगा जब आप फीस देकर परीक्षा देंगे। इसके लिए सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं। फिर ना तो बेरोजगारी भत्ता मिलता ना सरकारी सुविधाएं। हां यदि आप कही बाइक से जा रहे हैं तो पुलिस वाले को जुर्माना देने के तैयार रहें।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार
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