4 जुलाई 2011 के कुछ समाचार पत्रों में एक समाचार छपा था जिसे दिल्ली से एजेन्सी के माध्यम से जारी किया गया था। इस समाचार में बताया कि अब केन्द्रीय पुलिस की कैंटीन में भी सेना जैसी व्यवस्था होगी और पुलिस के आला अधिकारियों को याने सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के प्रमुख और महानिदेशक को केन्द्रीय पुलिस की कैंटीन से जितनी चाहे उतनी निःशुल्क शराब उपलब्ध होगी। यह निर्णय पुलिस बलों के वेलफेयर एण्ड रिहैबिलेशन बोर्ड की बैठक में लिया गया,  जिसकी अध्यक्षता सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रमन श्रीवास्तव ने की थी। इस नई कोटा प्रणाली के तहत इन बलों के अन्य अधिकारियों और जूनियर श्रेणी के अधिकारियों के लिये रम, बोदका, बियर आदि पूरे देश में पुलिस कैंटीन के माध्यम से उपलब्ध कराई जायेगी। नए निर्णय के तहत शहीदों के परिजन और सेवा निवृत्त कर्मचारी भी तीन बोतल शराब ले सकते हैं।

वेलफेयर एण्ड रिहेबिलेशन बोर्ड का गठन सुरक्षा बलों के कल्याण तथा पुनर्वास के लिये किया गया था,  परन्तु यह कितना आश्‍चर्यजनक है कि पुलिस के उच्च अधिकारियों ने कल्याण का मतलब मुफ्त शराब माना है। आखिर इसका क्या औचित्य है? शराब के प्रभाव सेना और पुलिस पर कितने बुरे पड़ रहे हैं, इसकी कल्पना भी इन उच्च अधिकारियों को नहीं है। सेना के अधिकारी और जवान जब छुट्टी में अपने घर को जाते हैं, तब कैंटीन से मुफ्त शराब ले जाते हैं। रास्ते में शराब पीकर, रेल यात्रियों से झगड़ा करते हैं, अभद्रता करते हैं और अक्सर महिलाओं से अभद्रता करने के लिये तैयार रहते है। महिला यात्रियों के लिये सेना, पुलिस के जवान सहयात्री के बजाय भय और आतंक का पर्याय बन गये हैं। आये दिन अखबारों में इस प्रकार की घटनाओं के समाचार आते रहते हैं।

पुलिस बल भी शराब के चलन में कितनी बिगड़ चुका है और शराब उनके परिवारों को कैसे बरबाद कर रही है, अब यह चिन्ता का विषय है। अभी हाल में झॉंसी के पास एक स्टेशन से पुलिस-सिपाहियों की दो बच्चियों को रेलवे स्टेश्‍ान से पकड़ कर ले गये और पुलिस थाने में अपने ही भाइयों की बच्चियों के साथ बलात्कार किया। शराब का कल्याण और पुर्नवास से क्या संबंध है? अगर ऐसे ही निर्णय करना है तो फिर सरकार को चाहिए कि इस ''वेलफेयर एण्ड रिहेबिलेशन बोर्ड''  को समाप्त करे या उसका नाम '' पुलिस विनाश या बर्बाद बोर्ड''  रख दें। शराब अपने आप में एक बड़ी सामाजिक बुराई है जो न केवल व्यक्ति को उत्तेजित और अपराध की ओर प्रवृत्त करती है बल्कि परिवार और समाज में कलह, असामाजिकता और अपराधीकरण की प्रवृत्ति को विकसित करती है। जो अधिकारी यह निर्णय कर रहे हैं वे अपने ही समाज के कल के भविष्‍य को नहीं देख रहे। इसी पुलिस के बच्चे शराब के अभ्यस्त बनेंगे और फिर शराब के लिये अपराध करेंगे।

जो सिपाही सीमा की रक्षा में शहीद हो गये, उनके परिजनों को भी मुफ्त और सस्ती शराब की व्यवस्था का उद्देश्‍य क्या है? उनके परिजनों का तात्पर्य क्या है? उनके परिजन में वृद्ध माता पिता हो सकते है। जिनकी आवश्‍यकता शराब नहीं बल्कि दवा हो सकती है। उनके परिजनों में बीबी, बच्चे हो सकते हैं जिनकी आवश्‍यकता शिक्षा और चिकित्सा हो सकती है, शराब तो बिल्कुल नहीं। कुल मिलाकर यह निर्णय पुलिस और समाज को घोर पतन की ओर ले जाने वाला है। शराबी अधिकारियों के द्वारा लिया गया यह निर्णय आपराधिक निर्णय है जिसे तत्काल रद्ध किया जाना चाहिए।

लेखक रघु ठाकुर भोपाल में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.