जगमोहनमैं जज नहीं हूँ. वकील भी नहीं. महज़ पत्रकार हूँ आप ही की तरह. अभी भी सीख ही रहा हूँ तीस साल से. जो सीख पाया हूँ वो ये कि हम न होते तो लोगों में दम न होते. हमारे जैसी न्यापालिका न होती तो हम पे भी रहम न होते. हम सब के सब पता नहीं कब के जे डे हो गए होते. पहले राजनीति शास्त्र, फिर संवैधानिक विधि का छात्र और फिर एक पत्रकार के नाते मैंने पाया है कि हमारे संविधान में इस जैसी न्यायपालिका की परिकल्पना हमारी व्यवस्था के स्थायित्व की एक महत्वपूर्ण शर्त है. हमें इसकी गरिमा बचा ही नहीं, बढ़ा के रखनी चाहिए. अकेले पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने पिछले एक साल में कोई आधा दर्जन जजों को नौकरी से निकाला है तो ज़रूर कुछ कमियाँ होंगी ज़िम्मेवारियों के निर्वहन में. लेकिन यही अपने आप में इसका प्रमाण है कि इस न्याय व्यवस्था में स्वयं अपने परिमार्जन का गुण और क्षमता है.

कोई ज़रूरत नहीं है कि उसके लिए मीडिया को किसी के चरित्रहनन की हद तक दखल देना पड़े. खासकर तब कि जब नीरज ग्रोवर के मामले में मारिया की कम सजा का कारण खुद सजा देने वाला जज नहीं भी हो सकता है. विवेचना हो सकती है. वो भी क़ानून और उसकी प्रक्रिया के जानकारों के द्वारा. आलोचना, वो भी क़ानून से अनजान लोगों के द्वारा नहीं होनी चाहिए. आपराधिक दंड संहिता प्रक्रिया के अंतर्गत दंड किसी भी अपराधी को दिलाने का काम और उत्तरदायित्व राज्य यानी अभियोजन का है. सुविधा के लिए इसे सरकारी वकील कह लीजिए. मान लीजिए कि उसी ने सबूत और तर्क ठीक से पेश नहीं किये हैं कोर्ट में तो कोर्ट क्या करेगी? क्या हम चाहेंगे कि अदालतें अपराधियों को सबूतों और दलीलों की परवाह किये बिना अपनी इच्छा या विवेक से दंड देती फिरें. अगर ऐसा हुआ क्या अराजकता नहीं हो जाएगी? ये देखते हुए कि पुलिस तो वैसे भी किसी को भी 'मुर्गा' बना के 'टांग' देने के लिए तैयार बैठी रहती है. दंड विधान तय करते समय इसका एहसास संविधान निर्माताओं को भी रहा होगा. इसी लिए कहा और माना जाता है कि दस गुनाहगार बच जाएँ बेशक, मगर एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए. ये बड़ा कारण है कि कोई भी जज क्रिकेट में बल्लेबाज़ की तरह अभियुक्त को शक का लाभ देता है.

कोई भी पीड़ित पक्ष किसी भी अभियुक्त के लिए कठोरतम दंड की अपेक्षा करता है. पर, अदालत को लिखित, निर्धारित संहिता के अधीन चलना है. फिर भी मान लीजिए कि किसी जज से कुछ त्रुटि हुई. तो इसके लिए उस से ऊपर और फिर उस से भी ऊपर की अदालत है न! मान के चलिए कि संहिता की अवहेलना की हो तो वो फैसला या वो जज भी बच नहीं पाएगा. लेकिन प्रश्न है कि उसके फैसले की समीक्षा करेगा कौन. क्या पीड़ित पक्ष? या कि मीडिया? और उसमें भी वे पत्रकार जिन्हें मालूम ही नहीं है कि दंड विधान संहिता होती क्या है? अपनी समझ से अदालतों की यूं खुल्लमखुल्ला छीछालेदर से न्यायपालिका की गरिमा कम हुई है. यही नहीं होना चाहिए. आम आदमी की नज़र में अदालतें इतनी बदनाम नहीं होनी चाहियें. इस से उन पर से भरोसा उठता है. और इस से भी बड़ी बात कि जज उस समाज में अलोकप्रिय होता है, जिसमें कि उसे भी रहना है. जज अगर लोकप्रियता या जनता की पसंद के अनुरूप निर्णय करने के लिए बाध्य होंगे तो निश्चित ही उन्हें दंड संहिता के प्रावधानों को ताक पे रखना होगा. और वो बड़ी गंभीर स्थिति होगी.

अब इसी नीरज ग्रोवर हत्याकांड को ले लीजिए. हिंदी के एक मूर्धन्य चैनल पे नीरज के पिता ने कुछ ऐसा कह दिया कि जिसके लिए स्वयं चैनल को माफ़ी मांगनी पड़ी. सवाल है कि हम क़ानून की प्रक्रियाओं या अदालतों की सीमाओं से अनभिग्य लोगों से अदालती निर्णयों पर टीका टिपण्णी करा ही क्यों रहे हैं? वे पीड़ित हैं. कुछ भी कह के गए, उन का क्या? उनकी फेंकी थूक चाटनी तो चैनल को पड़ी. सिर्फ इस लिए कि चैनल को टीआरपी चाहिए थी. अपनी टीआरपी के लिए क्या हम किसी को कुछ भी कह लेने दें? आप किन्हीं विधि विशेषज्ञों को बुला कर व्यवस्थापरक कुछ चिंतन मनन करें, अच्छी बात है. लेकिन अनपढ़ों के ज़रिये गरियायें क्यों? क्या होता अगर कोई सक्षम अदालत आपको अवमानना के अपराध में अन्दर कर देती और फिर आपका लायसेंस रद्द कर देना सरकार की मजबूरी हो जाती? इस हत्याकांड और उस पर मचे इस बेमतलब बवाल के सन्दर्भ में हमें कुछ आत्मविलोचन करना होगा. हमें किसी भी अदालत और खासकर किसी जज के बारे में व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचना होगा. फैसला गलत हो तो उसके निदान हैं. ऊपर की अदालतें हैं. लेकिन अदालत या जज के अपमान का कोई उपाय नहीं है. सच पूछिए तो जज दया के पात्र हैं. जानिए कैसे?

मुंसिफ यानी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट से लेकर एडीजे यानी अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश तक के जज बहुत अच्छे हालात में नहीं रह रहे हैं. अभी कोई साल भर पहले तक उनके वेतन उनके रीडरों से भी कम थे. जहां कहीं सरकारी मकान एसडीएमों या तहसीलदारों से नहीं बचे हैं तो उन्हें प्राइवेट मकानों और वो भी नहीं हैं तो किन्हीं रेस्ट हाउसों के एक और वो भी कई बार नान एसी कमरे में रहना पड़ रहा है. एसपी सुरक्षा के लिए एक अदद सिपाही देने के लिए उन से अपने यहाँ हाजिरी और बाहर बैठ के एकाध घंटा इंतज़ार की अपेक्षा करता है. सरकार उन्हें ऐसे जजमेंट राईटर तक नहीं देती जिन्हें अंग्रेजी आती हो (न मानों तो पंजाब हाज़िर है). एक सब इन्स्पेक्टर के दफ्तर में एसी कूलर नहीं भी होता तो आ जाता है. जज की अदालत में अपना भी है तो ला के लगा नहीं सकता. बीवी अगर उसकी नौकरी में है तो सरकार महीनों तक उसके साथ उसका तबादला नहीं करती. कितने ही जज ऐसे हैं कि सुबह से शाम तक खूंखार अपराधियों को सजायें देने के बावजूद उनके परिवार तो क्या, खुद उनके अपने लिए भी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है. मैं एक ऐसे जज को जानता हूँ,  जिसका पुलिस ने अपनी बीमार माँ को दवाखाने के सामने उतारते सिर्फ इस खुंदक में रौंग पार्किंग का चालान कर दिया कि वो जब चाहे थाने वालों को हर किसी का पुलिस रिमांड नहीं देता था.

मैं नहीं कह रहा कि सरकार उन्हें सुविधायें नहीं देती तो उन्हें जो करना है कर लेने दो. मैं सिर्फ ये कह रहा हूँ कि वे भी इंसान हैं. उन्हें भी इसी समाज में रहना है. उन्हें कम से कम वहां उपेक्षित और असुरक्षित न करो. जो कानून के जानकार नहीं हैं, उन से फैसलों पे बुलवाना और बोलना बंद करो. जैसे हमें किसी अच्छी स्टोरी पे बायलाइन देख कर वो सारा दिन अच्छा लगता है वैसे ही उन्हें भी कोई अच्छा फैसला दे कर उस रात बड़ी अच्छी नींद आती है. तो दोस्तों, विधि विशेषज्ञों के ज़रिये विवेचना करो, आलोचना नहीं. टीआरपी या किसी भी और कारण से जजों या न्यायपालिका की गरिमा कम न करो. वो रही तो अपने ही काम आएगी.

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों वेब मीडिया की दुनिया में सक्रिय हैं.