झारखंड में असंगठित मजदूरों की संख्या लाखों में है। इसमें बीड़ी मजदूरों का एक बड़ा तबका शामिल है। इन मजदूरों का दुर्भाग्य यह है कि उनकी वास्तविक संख्या राज्य सरकार के पास नहीं है। राज्य सरकार बीड़ी उद्योग से जुड़े मजदूरों के हालात से नावाकिफ है। सरकार के पास बीड़ी मजदूरों से संबंधित जो आंकड़े हैं, वह हास्यास्पद है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि केंद्र सरकार के पास झारखंड के बीड़ी मजदूरों के संबंध में कोई विशेष जानकारी होगी, बेमानी है। इन परिस्थितियों में राज्य सरकार या केंद्र सरकार द्वारा बीड़ी मजदूरों के लिए बनाई गई योजनाएं कितनी उपयोगी होंगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। सूचना अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त आंकड़ों के अनुसार राज्य सरकार के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग की नजर में पाकुड़ जिले में मात्र 2589 मजदूर हैं। पर वास्तविकता यह है कि इस जिले में बीड़ी मजदूरों की संख्या 25 हजार से भी अधिक है।

हैरत की बात तो यह है कि पाकुड़ स्थित भारतर सरकार के श्रमिक औषधालय में भी मजदूरों की सही संख्या दर्ज नहीं है। इस औषधालय में निबंधित मजदूरों की संख्या 4457 है। इसका मतलब यह है कि पाकुड़ जिले के मजदूरों की वास्तविक संख्या न तो राज्य सरकार के पास है और न ही पाकुड़ स्थित श्रम औषधालय में है। कमोबेश यही स्थिति चतरा जिले की भी है। इस जिले में स्थित भारत सरकार द्वारा संचालित स्थैतिक केंद्र में निबंधित बीड़ी मजदूरों की संख्या 6000 है। लेकिन राज्य सरकार के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग की नजर में इन मजदूरों की संख्या मात्र 200 है। इसी प्रकार राज्य सरकार के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार देवघर जिले में बीड़ी मजदूरों की संख्या 4897, साहबगंज में 251, दुमका में 892, गोड्डा में 867, हजारीबाग में 600,  पूर्वी सिंहभूम में 6500 और पलामू में 384 है। इनमें से कोई भी आंकड़ा वास्तविक आंकड़ों से मेल नहीं खाता है। वास्तविकता यह है कि अकेले साहबगंज, पूर्वी सिंहभूम व देवघर में ही लाखों की संख्या में बीड़ी मजदूर काम करते हैं।

इन आंकड़ों से बीड़ी मजदूरों की उपेक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। बीड़ी मजदूरों के प्रति सरकार की उपेक्षा और लापरवाही के कारण ही मजदूरों की स्थिति आज भी वैसी है, जैसी आजादी के बाद के दिनों में थी। देश को आजादी मिलने के बाद बहुत कुछ बदला। लेकिन बीड़ी मजदूरों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया। दुख की बात तो यह है कि सरकार ने बीड़ी मजदूरों की उपेक्षा तो की ही बीड़ी उद्योग में लगी कंपनियों ने भी इनके साथ न्याय नहीं किया। ये कंपनियां भी बीड़ी मजदूरों का शोषण-उत्पीड़न ही करती रहीं। इन कंपनियों के पास भी बीड़ी मजदूरों की वास्तविक संख्या नहीं है। सच पूछा जाए तो बीड़ी उद्योग में लगी कंपनियां जानबूझकर बीड़ी मजदूरों की वास्तविक संख्या जाहिर नहीं बीड़ीकरना चाहती हैं। ये कंपनियां यह भी नहीं चाहती कि मजदूरों का संगठन मजबूत हो और वह उनके लिए परेशानी का सबब बने। दरअसल झारखंड में बीड़ी उद्योग चलाने वाली लगभग सभी कंपनियां झारखंड से बाहर की हैं। ये कंपनियां बिचौलियों व दलालों के माध्यम से झारखंड में बीड़ी का कारोबार चलाती हैं। इसके कारण कंपनियों का मजदूरों से सीधे तौर पर कोई सरोकार नहीं होता है। कंपनियां यह चाहती भी नहीं है। यही वजह है कि मजदूरों को मिलने वाला लाभ इस धंधे में लगे बिचौलिये और दलाल गटक लेते हैं।

यह भी दुर्भाग्य की बात है कि झारखंड राज्य के गठन के 11 साल बाद भी बीड़ी मजदूरों की समस्या किसी राजनीतिक पार्टी का एजेंडा नहीं बना। बीड़ी मजदूरों की इन तमाम समस्याओं की जड़ उनका असंगठित होना है। अब सवाल यह उठता है कि बीड़ी का कारोबार आजादी के पहले से चल रहा है, फिर भी इस कारोबार से जुड़े मजदूरों का संगठन क्यों नहीं बन पाया? इस सवाल के जवाब में ट्रेड यूनियन सीआईटीयू से जुड़े माणिक मिश्रा ने बताया कि बीड़ी बनाने के काम से ज्यादातर महिलाएं जुड़ी हैं। इन महिलाओं में भी 80 फीसदी महिलाएं मुस्लिम वर्ग की हैं। ये महिलाएं पर्दानशीं होती हैं। ये घर से बाहर नहीं निकलती हैं। ये अपने घर में परिवार के साथ काम करती हैं। यह जिला मुख्यालय से बाहर निकलने को कतई तैयार नहीं होती हैं। ऐसे में इन महिलाओं को संगठित करना मुश्किल होता है। यही वजह है कि अब तक बीड़ी श्रमिक संगठित नहीं हो पाए हैं। बीड़ी मजदूरों से जुड़े ट्रेड यूनियन नेता कृष्णकांत मंडल कहते हैं कि बीड़ी मजदूरों के अनऑरगेनाइज्ड सेक्टर से बाहर नहीं निकलने की मुख्य वजह उनमें राजनीतिक चेतना और सक्रियता का अभाव है। बीड़ी श्रमिकों को अपने अधिकारों की भी जानकारी नहीं रहती है। फिर भी उनमें राजनीतिक चेतना जगाने और अधिकारों के प्रति सजग करने के प्रयास जारी हैं।

लेखिका आलोका झारखंड में पत्रकार हैं.