कौशल किशोर 'वे डरते हैं/किस चीज से डरते हैं वे/ तमाम धन दौलत/गोला-बारूद-पुलिस-फौज के बावजूद?/ वे डरते हैं/कि एक दिन निहत्थे और गरीब लोग/ उनसे डरना बंद कर देंगे.' चार जून की मध्यरात्रि में देश की राजधानी दिल्ली में सरकारी दमन का जो कहर बरपाया गया, उसे देखते हुए गोरख पाण्डेय की यह कविता बरबस याद हो आती है। योगगुरू रामदेव के आह्वान पर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शामिल होने के लिए दूर-दराज से लोग आये थे। ये कोई अपराधी, गुण्डा या आतंकवादी नहीं थे। ये वे सामान्य जन थे जो अपने मत से सरकार चुनते हैं, सरकार बदलते हैं और सरकार के क्रियाकलाप व उसकी नीतियों पर अपना समर्थन जाहिर करते हैं या विरोध करते हैं। भारत का संविधान इन्हें यह अधिकार देता है। इसी के तहत ये रामलीला मैदान में इकट्ठा थे।

विनायक विजेता: सुशासन का हाल-2 : कई घोटालों कारण अक्सर सुर्खियों में रहा बिहार के घोटाला अध्याय में एक और अध्याय जुड़ने वाला है। यह अध्याय वीपी मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के नियंत्रणाधीन पूर्णिया के दो इंजीनियरिंग कॉलेज से जुड़ा है। पूर्णिया में मीलिया इंस्ट्टीयूट ऑफ टेक्नॉलाजी और विद्या बिहार इंस्ट्टीयूट ऑफ टेक्नॉलाजी नामक दो इंजीनियरिंग कालेज है। बीते दिसम्बर माह में जामिया मीलिया के फाइनल ईयर के और विद्या बिहार के प्रथम वर्ष के छात्रों की परीक्षाएं हुईं। परीक्षा के बाद मूल्यांकन के लिए दोनों कॉलेजों की कापियां एमआईटी, मुजफ्फरपुर भेजी गई। मूल्यांकन के दौरान इन दोनों इंजीनियरिंग कॉलेजों के लगभग सत्तर प्रतिशत परीक्षार्थी अनुतीर्ण हो गए। इसके बाद इस मामले में खेल शुरू हो गया।

Dr Nutan Thakurउत्तर प्रदेश में सूचना का अधिकार कानून की क्या स्थिति है और नियमों को ताकपर रख कर किस तरह से फैसले लिए जाते हैं इसकी एक बानगी मै आप लोगो के समक्ष रख रही हूँ. यह पूरा मामला अपने आप में कई सवालों को समेटे हुए है. इस उदहारण को देखकर आप ही निर्णय करे कि क्या यह आदेश सही है? मामला कुछ इस प्रकार है- यू.पी पावर कारपोरेशन में कार्यरत अमित श्रीवास्तव नाम के एक कर्मचारी की पत्नी भावना श्रीवास्तव ने अपने पति के वेतन और भत्तो से सम्बंधित सूचना मांगी थी. साथ ही उसने सरकारी अभिलेखों में पति द्वारा अपने परिवार के सम्बन्ध में दी गई जानकारी की भी सूचना मांगी थी.

यूं तो मांग और आवक के आधार पर खाद्य पदार्थों की कृत्रिम कमी पैदा कर आम जनता की जेबों पर लम्बे समय से डाका डाला जा रहा है, परन्तु सुप्रीम कोर्ट के पान मसाला-गुटखा सम्बन्धी दिये गये आर्डर से देहरादून में कालाबाजारियों की लाटरी निकल पड़ी है। देहरादून प्रशासन की उदासीनता का लाभ उठाकर शार्टेज के नाम पर पान मसाला एवं गुटखा को दोगुने से भी अधिक कीमतों पर धड़ल्ले से बेचा जा रहा है।पान मसाला एवं गुटखा के पाउच कभी ब्लैक में भी बिक सकते हैं शायद ऐसा इनको बनाने वाली निर्माता कम्पनियों ने भी नहीं सोचा होगा। परन्तु सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के कारण अब ऐसा भी हो रहा है कि पान मसाला एवं गुटखा के पाउच देहरादून की हर गली, चौराहे पर खुलेआम बगैर किसी भय के दोगुने-चौगुने दामों पर बेचे जा रहे हैं।

संजीव चौहान: बुश को जूता, बापू को अंगूठी : द लास्ट सैल्यूट ! :  तारीख 15 मई 2011 । दिन रविवार। समय शाम करीब पौने पांच बजे। जगह दिल्ली में राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधी । समाधी के चारों ओर चिलचिलाती धूप ।  पसीने से तर-ब-तर जबरदस्त भीड़। क्या बच्चे, क्या बूढ़े-जवान । सबको पड़ी है, करीब से बापू की समाधि के दर्शन करने की। समाधि के इर्द-गिर्द शोर के नाम पर गिलहरियों की चीं-चीं और कौवों की कांव-कांव। कभी-कभार बीच-बीच में समाधि के चारों ओर मौजूद हरी घास पर अनजाने में घुस आये बच्चों को हटाने के लिए गार्ड द्वारा बजाई गयी सीटी की आवाज ध्यान को भंग करती है। भीड़ में इक्का-दुक्का फोटोग्राफर हैं, जो लोगों को बुला-बुलाकर ग्रुप में बापू की समाधि के बैक-ग्राउंड में यादगार फोटो खिंचवाने को प्रेरित कर रहे हैं।  दो जून की रोटी के जुगाड़ में।

बाबा रामदेव का अहिंसात्मक सत्याग्रह और परेशान काला धन के मालिक... जी हां!  ये सिर्फ बाबा रामदेब का आन्दोलन नहीं है अपितु इस देश में रहने वाले नागरिक के द्वारा काला धन की वापसी के लिये किया गया अहिंसात्मक सत्याग्रह आन्दोलन है... जिसे ना तो सत्ता पर विराजमान चोर कांग्रेसी अपने बूटों से रौंद सकता है और ना ही महिलाओं के साथ ओछी हरकतें कर के इसे खतम करने का दावा कर सकता है...   अरे काले धन के आकाओं तुम जितना भी लाठी चलाओगे या आंसू गैस के गोले दागोगे ये आन्दोलन और अक्रामक होता जायेगा... जिसे तुम क्या कोई भी रोक नहीं पाएगा...  याद करो उस समय को जिस वक्त ये देश अंग्रेजों का गुलाम था...  हमने उस गुलामी की जंजीर को भी तोड़ा और हमें आजादी भी मिली... लेकिन तुम्हारी औकात क्या है...

: काठमांडू में 32 लाख के भारतीय जाली नोट बरामद :  पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत में आतंकवाद को ही नहीं बढ़ावा दे रही है बल्कि वह भारत की अर्थव्यवस्था की भी चूलें हिलाने में लगी हुई है। भारत में उत्तर प्रदेश के सोनौली, ककरहवा और बढ़नी तथा बिहार के रक्सौल से लगने वाली नेपाल की सीमा के रास्ते जाली नोटों की खेप भारत के विभिन्न प्रांतों एवं शहरों में पहुंचाई जा रही है। जाली नोटों की खेप पाकिस्‍तान से ही आ रही है, इस बात की तस्दीक एक बार फिर नेपाल के काठमांडू में जाली नोटों के एक सप्लायर के पकड़े जाने के बाद हुई है। काठमांडू में पकड़े गए पाकिस्तानी नागरिक के पास से नेपाली पुलिस ने 32 लाख के जाली भारतीय नोट बरामद किए हैं। हालांकि नेपाली पुलिस सप्लायर को कैरियर बता रही है। जाली नोटों की बढ़ती तस्करी ने भारत के उद्यमियों, आम नागरिकों यहां तक की बैंकों तक को परेशानी में डाल दिया है।

ब्लॉग की दुनिया में अब वीर बहादुर सिंह पूर्वाचल विश्वविद्यालय जौनपुर भी अपनी बात रखने आ गया हैं. अपनों से दो तरफा संवाद स्थापित करने के लिए के कुलपति प्रो.सुन्दर लाल ने पूरब बानी ब्लॉग बनाया है. यह ब्लॉग विश्वविद्यालय का आधिकारिक ब्लॉग हैं. ब्लॉग आज अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम हैं. इसके द्वारा बहुत ही आसानी से अपनी बात वैश्विक स्तर पर रखी जा रही हैं. खास हो या फिर कोई आम आदमी सबके ब्लॉग इन्टरनेट के माध्यम से पढ़े जा रहे हैं और चर्चा का विषय बन रहे हैं. देश में कुछ गिने चुने ही शायद ऐसे सरकारी विश्वविद्यालय होंगे जिनका अपना ब्लॉग हो.

कुमार सौवीरपूर्वांचल में साधुओं की जान पर एक बार फिर बन आयी है। चार साल पहले थमी निरीह और बूढ़े साधुओं की हत्‍या के बाद यह सिलसिला फिर शुरू हो गया। बीती रात जौनपुर जिले के खुटहन के अंगुली गांव के एक मंदिर की दशकों से देखभाल कर रहे श्रीराम नाम के साधु की सिर कूंच कर हत्‍या कर दी गयी। पुलिस इस मामले की छानबीन कर रही है, लेकिन प्रथमदृष्‍टया यह मामला मंदिर की जमीन कब्‍जाने को लेकर हुआ लग रहा है। इस घटना ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। गौरतलब है कि पूर्वांचल के जौनपुर और आजमगढ़ समेत कई जिलों में सन 2004 से मंदिरों की व्‍यवस्‍था सम्‍भालने वाले साधुओं की ताबड़तोड़ हत्‍याओं ने सनसनी फैला दी थी। अगले तीन साल के भीतर करीब 32 साधुओं की जघन्‍य हत्‍याएं हुई थीं।

विनायक विजेता: सुशासन का हाल-1 : गोपालगंज जेल के डाक्टर भूदेव की हत्या के बाद सरकार की कुंभकर्णी नींद तो खुली है पर सरकार और कारा विभाग के आलाधिकारियों की नाक के नीचे ही जेल का जो खेल चल रहा है उस पर सरकार की नजर नहीं है। यह एक तल्ख और चौकाने वाली सच्चाई है कि बिहार की जेलों पर एक तरह से एक खास व्यक्ति का अघोषित साम्राज्य बीते बीस वर्षों से कायम है। इस शख्स का नाम है वीरचंद प्रसाद सिंह। लालू-राबड़ी सरकार में सरकार और कई नेताओं के काफी करीबी माने वाले व कई वर्षों तक बक्सर सेंट्रल जेल में उपाधीक्षक रहे वीसीपी सिंह को 1992 में प्रमोशन देकर उप-निदेशक जेल उद्योग बनाया गया। तब से लेकर अबतक वह इसी पद पर विराजमान हैं। कारा विभाग में विभागीय गुरु के नाम से जाना जाने वाले वीसीपी सिंह के बारे में यह चर्चा है कि बिना उनकी सहमति के विभाग का पत्ता भी नहीं हिलता।

सुरेश मिश्रनक्सलियों ने अब अपना जाल सेन्ट्रल यूपी में भी फैलाना शुरू कर दिया है. खबर है कि यूपी के औरैया से जहां आज पुलिस ने 9 पिस्टलों और 5 मैगजीनों के साथ 2 खूंखार अपराधियों को पकड़कर इस बात का खुलासा किया है.  मध्य प्रदेश और बिहार से भारी मात्रा में खतरनाक हथियार खरीद कर उत्तर प्रदेश और झारखण्ड के कई हिस्सों में सप्लाई करने वाले पकडे़ गए इन अपराधियों के सम्बन्ध नक्सलियों से भी हैं. पुलिस की पूछताछ में इस बात का खुलासा हुआ है कि पकडे़ गए ये दोनों अपराधी पिछले कई वर्षों से नक्सलियों के संपर्क में हैं और उनको खतरनाक असलहे सप्लाई किया करते थे और इन्हीं असलहों के द्वारा नक्सली बेगुनाहों के खून की होली खेलते हैं.

अमिताभ Presently I am coming in regular contact with a person who can easily be called an eminent police academician. He is Prof Lawrence Sherman, presently at Institute for Criminology, University of Cambridge, UK. He talks of Evidence Based policing day and night. That is his passion, which is his professionals well. For those of you who are not very conversant with this concept, what it fundamentally means is that the rigours of scientific research methods and methodologies shall be sincerely and diligently applied to each and every aspect of policing to a much larger extent and in a much deeper manner.

पुरुषोत्‍तम मीणादेश की राजधानी नयी दिल्ली सहित देश के हर हिस्से में रेलवे स्टेशनों और तकरीबन सभी मेल-एक्सप्रेस गाड़ियों में रेलवे द्वारा अधिकृत तौर पर बेचे जाने वाने रेल नीर के स्थान पर सरेआम नकली और असुरक्षित बोतलबन्द पानी की आपूर्ति और बिक्री की जा रही है. रेलवे अधिकारियों की मिलीभगत से राजधानी, दूरन्तो, शताब्दी जैसी नामी-गिरामी रेल गाड़ियों में भी रेल नीर की बोबलों में पैंकिंग करके नकली पानी पहुंचाया और बेचा जा रहा है. यात्रियों द्वारा शिकायत करने पर या मीडिया द्वारा खबर प्रकाशित करने के बाद कुछ दिनों तक मामला शान्त रहता है और कुछ दिन बाद फिर से सबकुछ यथावत जारी कर दिया जाता है.

जुगनू शारदेयपाखंड और आत्ममोह बिहार की विशेषता है। इससे जब पर्यावरण जैसे विषय जुड़ जाते हैं तो यह पाखंड और आत्ममोह और बढ़ जाता है। एक मायने में बिहार ही नहीं पूरा देश इस पाखंड से जुड़ा है। कभी मेनका गांधी ने इसे बढ़ावा दिया। अब जयराम रमेश इसे बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसी हालत में अगर बिहार इसे बढ़ावा दे रहा है तो इसमें कुछ अनोखा नहीं है। सालाना रस्म अदायगी है 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाना। फिर भारतीय परंपरा में इसे भूल जाना। यह भारतीय राज्य की विशेषता है कि जीवन से जुड़ी हर चीज को नष्ट करने के बाद उसे बचाने का बड़ा भारी भगीरथ प्रयास होता है। यह भी एक भारतीय परंपरा है कि हर चीज जो पश्चिम से या अमेरिका से आती हो , बहुत ही महान होती है। पर्यावरण भी यूरोपीय सोच – समझ है। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अपना लिया।

पहले हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने पर उच्च वेतनमान पर नौकरी पाना बहुत आसान नहीं था, खासकर प्रबंधन व आईटी क्षेत्रों में। गरीब लोग अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा न प्राप्त कर पाने के कारण निजी संस्थानों में उच्च वेतनमान पर रोज़गार पाने में असमर्थ हो जाते थे, लेकिन अब कम्प्यूटर और आईटी क्षेत्र में भी कैरियर बनाना हिंदी भाषी लोगों के लिए बिल्कुल आसान होने जा रहा है। अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण निराश विद्यार्थी अब हिंदी के बूते इस क्षेत्र में अपना लक्ष्य पूरा कर सकेंगे क्योंकि हिंदी भाषा को ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में संमृद्ध करने तथा रोजगारोन्मुख बनाने के उद्देश्य से स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने पहली बार हिंदी माध्यम से एमबीए, बीबीए, एमए इन कंप्यूटर लिंग्विस्टिक्स, मास्टर ऑफ इन्फारमेटिक्स एण्ड लैंग्वेज इंजीनियरिंग, पीएचडी इन इन्फारमेटिक्स एण्ड लैंग्वेज इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम शुरू किया है।

गिरीश मिश्रहाल के विधानसभाई चुनावों के नतीजों को क्या क्षेत्रीय-आंचलिक लोकतंत्र की मजबूती का संकेत माना जाए और यह समझा जाए कि 1967 में जो गैर कांग्रेसी सरकारें विभिन्न राज्यों में पहली बार प्रमुखता से सामने आईं थीं, उस प्रवृत्ति ने अब मजबूती से नई शक्ल अख्तियार कर ली है ? या फिर यह माना जाए कि राष्ट्रीय पार्टियों की जगह अब क्षेत्रीय अस्मिता नई सियासी शक्ल के रूप में सामने आ रही है. या फिर बडे दलों से लोगों का मोहभंग हो रहा है? मतदान का औसतन 80 फीसदी होना और कहीं 85 प्रतिशत तक इसका पहुंचना क्या यह नहीं बताता कि अब लोग कहीं ज्यादा जागरूक हैं और वे चुनाव जैसे लोकतांत्रिक पर्व में अपनी अहमियत बखूबी समझ रहे हैं.