दिनेश चौधरीयद्यपि विपक्ष के उभरते हुए नेता विश्वमित्र को 'सेक्स स्केण्डल' में फंसा देने के बाद इंद्र का आसन काफी सुरक्षित हो चला था, फिर भी अगले आम चुनावों में गद्‌दी बनाये रखने के प्रयोजन से इंद्र ने अपनी छवि बनाने के लिये बड़े घरानों पर छापे डालने शुरू कर दिये। देवराज की यह कार्रवाई धनाढ्‌य व्यवसायी कुबेर के लिये अहितकारी हो सकती थी, अतः काली लक्ष्मी के सदुपयोग के उद्‌देश्य से कुबेर ने अपने निजी सहायक से गहन विचार-विमर्श किया। बहुत सोच-विचार कर निजी सहायक ने कुबेर को एक अखबार के प्रकाशन की सलाह दी और इस संबध में एक नोट-शीट तैयार की। पाठकों की सुविधा के लिये इस नोटशीट को ज्यों का त्यों रखा जा रहा हैः

॥श्री लक्ष्मी जी सदा सहाय॥

अखबार का अभिप्राय

भोजपत्र पर विपुल मात्रा में तैयार किये जाने वाले ऐसे पत्रक, जिनसे नगरवासियों को प्रतिदिन प्रातः सोमरस -पान से पूर्व ही यह सूचना दी जा सके कि कल देर रात्रि तक नगरवासियों की सेवा में देवराज के क्या -क्या क्रियाकलाप रहे। इंद्र की सभा में किस सभासद ने किस सभासद को मर्कट, वानर, शूकर, क्षूद्र अथवा पशु के अलंकरण से अलंकृत किया; कौन सभासद अपने आसन के नीचे प्रवेश कर देव अथवा मानव वाणी से भिन्न एक विशेष प्रकार की बोली व्यवहार में लाने लगा अथवा किस तरह सभापति के आदेश पर एक सभासद को प्रहरियों ने बलपूर्वक सभाकक्ष से बाहर उठाकर फेंक दिया; इनका विवरण। उर्वशी से साक्षात्कार, मेनका द्वारा अंगों को सुडौल बनाये रखने संबंधी परामर्श, अप्सराओं के प्रेम-प्रसंग और विशेषज्ञों द्वारा धूत -क्रीड़ा की समीक्षा के अतिरिक्त पाठकों के मनोरंजन के लिये यह समाचार भी दिया जा सकेगा कि कल किस तरह एक नगरवासी ने एक नगरवासिनी का बलात शील भंग किया अथवा विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार किस तरह एक कथित आरोपी ने कथित व्यक्ति की कथित रूप से हत्या कर दी। इसके अतिरिक्त देवलोक की सुमुखी कन्याएं नगरवासिनियों को यह संदेश भी दे सकेंगी कि किस सुंगधित चूर्ण के लेप से उनकी त्वचा क्षीर-सी श्वेत व माखन-सी कोमल रहती है अथवा कौन-सा सुंगधित द्रव उनके नभ- से काले घने केशों के मूल में है। बलिष्ठ भुजाओं को प्रदर्शित करते हुए कामदेव यह संदेश भी दे सकेंगे कि पुरूषत्व की वृद्धि के लिये कौन-सी जड़ी-बूटी उपयुक्त होगी। इन संदेशों के एवज में अखबार को स्वर्ण-मुद्राओं की प्राप्ति होगी। भोजपत्र न सिर्फ सूचनाओं के आदान-प्रदान का एक सशक्त माध्यम बन जायेगा अपितु चूर्ण विक्रय के लिये पुडि़या बनाने के कार्य भी आयेगा।

अखबार के कर्मचारी गण

यद्यपि देवी सरस्वती से श्रीमन्‌ का कभी दूर का भी रिश्ता नहीं रहा तथापि प्रधान संपादक के दायित्व का निर्वाह वे स्वयं ही करेंगे। इस दायित्व से श्रीमन्‌ को किंचित भी चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनका मुख्य कार्य सभाओं, समारोहों का उद्‌घाटन करना, मुख्य अतिथि व अध्यक्ष बनना, लेखकों व बुद्धिजीवियों को संदेश देना तथा इंद्र की राज्य सभा में मनोनयन के लिये अवसर की खोज में लगे रहने का होगा। इन पुनीत कार्यों के लिये काले-कुरूप अक्षरों से संबंध रखना किंचित भी आवश्यक नहीं होगा। संपादन का शेष दायित्व दैनिक मजदूरी पर नियुक्त किये गये संपादक, उप-संपादकों का होगा लेकिन छापा-पंक्ति में श्रीमन्‌ का नाम ही सुशोभित होगा। सरस्वती की कृपा से उप-संपादकों की कलम की धार तीखी बनी रहे इस प्रयोजन से इस बात का विशेष ध्यान रखा जायेगा कि उन पर लक्ष्मी की छाया न पड़ सके। प्रकाशन सामग्री में अंतिम रूप से कांट-छांट का अधिकार श्रीमन्‌ का ही होगा क्योंकि लिखने वाले से छापने वाला बड़ा होता है। श्रीमन्‌ को यह अधिकार भी प्राप्त होगा कि वे उन संदेशों को, जिनके लिये विपुल मात्रा में स्वर्ण-मुद्रायें प्राप्त हुई हों, समाचार के स्वरूप में प्रकाशित कर दें। यह हमारे अखबार की नीति होगी और इस नीति का विरोध करने वाले संपादक को तुरंत प्रभाव से सेवामुक्त माना जायेगा। इनके अतिरिक्त न्यूनतम वेतन पर लिपिक वर्ग की नियुक्ति की जा सकेगी। संवाददाताओं पर किसी तरह का व्यय आवश्यक नहीं होगा। भ्रष्ट दरबारी -गण से उनके मधुर संबंध उनकी आजीविका के लिये सहायक होंगे।

आचार संहिता

अखबार के लिये आचार संहिता का निर्धारण यद्यपि स्वयं श्रीमन्‌ को ही करना है, तथापि आपको परामर्श दिया जाता है कि देवराज इंद्र की स्तुति ही प्रतिष्ठान के हित में होगी। इस कार्य के लिये विशेषज्ञों की सलाह ली जा सकती है व समय-समय पर उन्हें अतिथि संपादक के रूप में आमंत्रित किया जा सकता है। देवराज इंद्र के वक्तव्य प्रमुखता के साथ प्रकाशित होंगे तथा उनके जन संपर्क अधिकारी द्वारा जारी की गयी सूचनायें बिना किसी संपादन के मुख पृष्ठ की शोभा बढ़ायेंगे। नगर के प्रतिष्ठित व्यवसायियों द्वारा सुंदरियों के माध्यम से अपने उत्पाद के संबंध में नागरिकों को दिये जाने वाले संदेशों पर संपूर्ण बल दिया जायेगा। इसके पश्चात भी यदि कुछ स्थान शेष रह जाता है तो साहित्य, कला, नीति, धर्म इत्यादि विषयक सामग्रियों पर विचार किया जा सकता है। इन सामग्रियों का चयन संपादक स्व-विवेक के आधार पर कर सकता है, किन्तु ऐसी किसी भी सामग्री का प्रकाशन वर्जित होगा जो श्रीमन्‌ अथवा प्रतिष्ठान के विरूद्ध जाता हो। संपादक, उप-संपादक गण श्रीमन्‌ की प्रतिष्ठा का संपूर्ण ध्यान रखेंगे व उनके आगमन पर तुरंत आसन त्याग देंगे। प्रधान संपादक का अभिवादन न करने पर वाले कर्मचारी को तत्काल सेवा से वंचित कर दिया जायेगा।  सभी सपांदक व उप-संपादक गण श्रीमन्‌ के गृह में आयोजित किसी भी समारोह में संख्या बढ़ाने के लिये तत्पर रहेंगे। श्रीमन्‌ के आवास में ताजे दूग्ध, शाक, कंद, मूल, फल आदि पहुंचाने वाले तथा श्रीमन्‌ के श्वान को रथ में भ्रमण हेतु ले जाने वाले संपादकों को विशेष वेतन वृद्धि दी जायेगी। इसके अतिरिक्त वेतन-वृद्धि संबंधी किसी भी मांग को अखबार की स्वतंत्रता के विरूद्ध षड़यंत्र माना जायेगा और तद्‌नुसार कड़ी कार्यवाही की जायेगी। हम राजनीति के क्षेत्र में वंशवाद के घोर विरोधी रहेंगे किंन्तु स्वयं को इन नीतियों से मुक्त रखेंगे। श्रीमन्‌ के बाद श्रीमन्‌ के सुपुत्र ही अखबार के प्रधान संपादक होंगे।

प्रकाशन सामग्री

अखबार मूलतः अन्य पत्रिकाओं से अनूदित व 'साभार' ली गयी सामग्रियों पर आश्रित होगा। अत्यंत आवश्यक होने पर ही मौलिक सामग्री पर विचार किया जा सकेगा, किन्तु इसके एवज में स्वर्ण-मुद्रायें देना प्रतिष्ठान के लिये विधि सम्मत नहीं होगा। श्रीमन्‌ लिखे तथा छपे हुये शब्दों की गरिमा को जानते हैं तथा यह भी जानते हैं कि अमूल्य रचनाओं का मूल्य चंद स्वर्ण मुद्राओं में आंकना लेखक को अपमानित करना होगा। श्रीमन्‌ द्वारा ऐसी धृष्टता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हो सकता है कि हमारे इस निर्णय से कुछ लेखक रूष्ट हो जायें पर भडा़स निकालने की कुंठा व छपास नामक रोग के कारण वे उग्र विरोध की स्थिति में नहीं होंगे। शेष सामग्रियों का चयन पूर्व वर्णित प्राथमिकताओं के आधार पर किया जायेगा।

प्रकाशन का प्रयोजन

यद्यपि देवराज के चुनाव प्रचार के लिये हमने समय-समय पर आर्थिक सहायता दी है, तथापि वर्तमान स्थिति में हम उनसे अधिक सहयोग की अपेक्षा नहीं रख सकते। हम अपनी ओर से उनकी पूर्ण सहायता करेंगे, फिर भी किन्ही अपरिहार्य कारणों वश श्रीमन्‌ अथवा प्रतिष्ठान के विरूद्ध किसी भी कार्यवाही को अखबार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरूद्ध सीधा आक्रमण माना जायेगा और हमारी संपूर्ण लड़ाई संपादक-गण, पत्रकार व बुद्धिजीवी लड़ेंगे। हमें किंचित भी परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं होगी। श्रीमन्‌ यह बात भी स्पष्ट तौर पर समझ लें कि प्रकाशन अन्य उद्योगों की तरह तुरंत लाभ प्रदान करने वाला व्यवसाय नहीं है पर इसके दूरगामी परिणाम अत्यंत सुखद होंगे। इस उद्योग के बहाने श्याम-लक्ष्मी को श्वेत-लक्ष्मी में परिवर्तित किया जा सकता है। यद्यपि श्रीमन्‌ ने अब तक केवल धनार्जन ही किया है किंतु इस उद्योग में प्रधान संपादक के रूप में उन्हें अपार यश भी मिलेगा और वे इंद्र की राज-सभा में मानद सदस्य हो सकेंगे। प्रतिष्ठान को शासकीय कोटे से भोजपत्र भी मिलेंगे, जिनके व्यवसाय से अतिरिक्त आय हो सकेगी। अखबार की स्थापना के लिये नाममात्र की दरों पर देवनिवास क्षेत्र में भूमि का आंबटन भी संभव हो सकेगा। कलपूर्जों की आपूर्ति संबंधी निविदा को स्वीकृत कराने के लिये इंद्र के मुख्य यांत्रिक अभियंता श्री विश्वकर्मा को अलग से स्वर्ण-मुद्रायें अर्पित करने की आवश्यकता नहीं होगी। उनके क्रिया-कलापों को लेखा-जोखा योग्य संवाददाताओं द्वारा-जिन्हें खोजी पत्रकार कहा जायेगा-तैयार किया जायेगा। आवश्यकता पड़ने पर इसका प्रयोग किया जा सकेगा।

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए श्रीमन्‌ से निवेदन है कि वे यथा शीध्र अखबार उद्योग की स्थापना हेतु अपनी स्वीकृति से अवगत करायें।

लेखक दिनेश चौधरी से संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है.