Pankaj Chaturvedi : शराब कम पीनी चाहिए। अधिक-से-अधिक दो प्याले। डोमन साहु 'समीर' द्वारा लिखित और संकलित एक संताली लोक-कथा की यह व्यंजना है। एक आदमी ने पीपल के पेड़ के नीचे चूल्हा सुलगाया और उस पर महुए की हाँड़ी चढ़ाकर शराब बनाने की कोशिश की। मगर इसमें उसे ज़रा भी कामयाबी नहीं मिली। एक ओझा ने उसे सलाह दी कि 'जिस पेड़ के नीचे तुम यह कोशिश कर रहे हो, अगर उसे काटकर चूल्हे की आग में झोंक दो, तो बेहिसाब शराब बनेगी।'

उसने ऐसा ही किया। लेकिन उस पेड़ की शरण में चार जीव रहते थे---एक मैना, एक तोता, एक बाघ और एक सूअर। वे दिन-भर इधर-उधर घूमते रहते, पर शाम को लौट आते और रात उसी पेड़ की छाँव में बिताते। उस दिन जब वे एक-एक कर वापस आये ; तो अपने शरणदाता को इस तरह कटा हुआ, चूल्हे की आग में जलाया जाता देखकर इतने शोकाकुल हुए कि उस आदमी का कोई प्रतिकार करने की बजाए---बिछोह की वेदना के आवेग में----उन्होंने भी उस आग में जलकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। ओझा के कहे मुताबिक़ शराब भी बहुत हासिल हुई।

इसी का परिणाम है कि आज भी जब कोई शराब पीता है, तो पहले दोने के बाद मैना की तरह मीठी बातें करने लगता है। दूसरे दोने के बाद तोते की तरह उसकी वाणी चंचल हो जाती है और अक्सर वह गाने भी लगता है। जब तीसरा दोना ढलता है, तो वह बाघ की तरह गरजता और घमंड करता है और दुनिया में अपने को सबसे बढ़कर मानता है। लेकिन चौथे के बाद तो वह बेसुध हो जाता है और विवेक-रहित होकर सूअर के समान जहाँ-तहाँ लोटता है।

शराब के मामले में संयम का सुझाव अपनी जगह, लेकिन इस कहानी में प्रकृति और मानवेतर जीव-सृष्टि से संताली समाज का गहरा लगाव और उससे उपजी करुणा सहसा स्तब्ध कर देती है। दरअसल पेड़ों को अपनी जान गँवा देने की हद तक प्यार करना पशु-पक्षियों की ही नहीं, संताली जन की भी विशेषता है।

(डायरी--98)

पत्रकार पंकज चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.