एक बार एक कंपनी ने कुत्तों का ऐसा ग्रुप बनाया जो दूसरों के लिए काम करने के नाम पर मोटी फीस के बदले किराये पर दिया जाता था। कुत्तों को इस तरह ट्रेंड किया गया था कि वो किराए पर लेने वाले की सुरक्षा से ज़्यादा दूसरों पर भौंकने में ज़्यादा माहिर थे। एक बार किसी गांव का प्रधान जो पिछले कई साल से गांव पर राज कर रहा था उसके ख़िलाफ एक दूसरे प्रधान पद के उम्मीदवार की टीम ने इन कुत्तों को किराए पर मंगवा लिया। बस फिर क्या था रात दिन इन कुत्तों ने वर्तमान प्रधान के घर की तरफ मुंह करके इतना भौंका कि किसी के भी कान पड़ी आवाज़ तक आनी बंद हो गई। प्रधान भले ही कितना ही अच्छा काम करने का दावा करता रहा लेकिन कुत्तों के भौंकने की रफ्तार और उसके शोर के सामने किसी को प्रधान की आवाज़ तक सुनाई ही न दी। इतना ही नहीं प्रधान के ख़िलाफ कई दूसरे प्रत्याशी भी इसी शोर के बीच अपनी बात तक न रख सके। नतीजा कई सौ करोड़ रुपए में किराए पर लिये गये कुत्तों ने कई साल से जमे प्रधान के ख़िलाफ ऐसा माहौल बनाया कि बेचारा हार गया।
इसके बाद तो मानों इन कुत्तों की धूम ही मच गई। बड़े बड़े नेता और राजनीतिक दलों को इन कुत्तों की ताक़त का लोहा मानना पड़ा। क्योंकि अभी तक जो चुनाव मुद्दों और जनता को समझाने के नाम पर लड़े जाते थे अब महज़ विरोधी पर भौंकने के दम पर जीता जा सकता था। कुत्तों को सप्लाई करने वाली कंपनी भी बेहद समझदार थी। वो जीत सकने वाले दल और विरोधी की कमज़ोरी पर हमला करके अपना गेम प्लान बनाती थी।

इसके बाद दूर देस के एक छोटे से गांव में चुनाव होने थे। पूराने दल से किसी बात पर नाराज़ होकर या किसी सौदे के बिगड़ जाने पर कंपनी ने इस बार अपनी सेवाएं दूसरे दल को दे दी। चूंकि यह दल भी पहले से ही वहां सत्ता में था और उसके पास मेहनताना चुकाने को ख़ासा पैसा था। इसलिए कुत्ता सप्लाई कंपनी ने अपनी सेवाएं इसकों दी और इस बार छोटे गांव के प्रधान के विरोधियों के ख़िलाफ भौंककर प्रधान को अपने कार्यकाल में हुए कामों को जनता तक रखने का मौका दे डाला। नतीजा यह हुआ कि इस बार जनता तक दूसरे दलों के दावे पहुंच ही नहीं सके और उसने मौजूदा प्रधान के कामों को नंबर देते हुए अपना फैसला सुना दिया।

उधर बड़े गांव के हारे हुए प्रधान की टीम जो पहले से ही हताशा और हार के संकट में घिरी थी। उसको अपनी टीम की कमियों और अपनी कार्यशैली पर मंथन के बजाए कुत्ता कंपनी की कार्यशैली पर अधिक विश्वास बन गया। उसने अपनी कब्र खोदने वाली कंपनी को ही अपना मसीहा मान कर एक दूसरे छोटे से गांव की प्रधानी के चुनाव के लिए इस कंपनी को कई सौ करोड़ में ठेखा दे दिया।
इसके बाद कंपनी ने अपनी रणनीति के तहत उन पूराने ही मोहरों को दोबारा खड़ा कर दिया जो पहले से ही इस दल को डुबाए बैठे थे। चूंकि हारे हुए प्रधान के दल और उसके मुखिया को अपनी टीम और कार्यकर्ताओं से ज़्यादा कुत्ता कंपनी के स्टंट पर अधिक भरोसा था। इसलिए कंपनी द्वारा दी गई हर सलाह को माना जाने लगा।

लेकिन इतिहास गवाह है कि किराए पर लिया गया दूसरे पर भौंकने वाला कुत्ता अपने पुराने मालिक का हमेशा वफादार रहता है। जिसने उसको पाला पोसा या जिसने उसको भौंकने लायक़ बनाया अक्सर उसके प्रति वफादारी कम तो हो सकती है लेकिन ख़त्म नहीं।

सुनने में आ रहा है कि कुत्ता कंपनी को पूराने मालिक ने थोड़ी सी हड्डी दिखाई तो उसकी आधी ताक़त और वफादारी फिर से पुराने प्रधान के दल के साथ होती नज़र आ रही है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पुराने प्रधान के बजाए छोटे प्रधान को अपनी सेवाएं देते समय भी कंपनी के कुत्तों ने पुराने मालिक से वफादारी नहीं छोड़ी थी।

ऐसे में इंसानों के लिए सबसे बड़ी यही शिक्षा है कि वफादारी क्या होती है यह तो इन बेज़ुबानों से ही सीखा जाए। और पैसे के दम पर सत्ता हासिल करने के बजाए अगर हर प्रधान जनता को भरोसे में लेकर उनके मुद्दों को हल करते हुए राजनीति करे तो फिर शायद किसी बेज़ुबान को दूसरों पर भौंकने के लिए मोटी फीस भी अदा न करनी पड़े। साथ ही अगर हर राजनीतिक दल जनता से जुड़े असल मुद्दों को लेकर काम करे तो फिर किसी पी.आर कंपनी के किराए पर लिये गये गुर्गों द्वारा मचाए गये शोर की ज़रूरत ही न पड़े और न ही उनके शोर में जनता और देश से जुड़े मुद्दे दब कर दम ही तोड़ें।

कहानी पूरी तरह काल्पनिक है इसका किसी राजनीतिक पार्टी या नेता से कोई लेना देना नहीं है। कृपया कहानी की काल्पनिक घटनाओं को लोकसभा चुनाव में कार्य कर चुकी किसी कथित टीम पीके या अब वर्तमान में सत्ता से बाहर हो चुके किसी दूसरे दल के लिए काम करने को जोड़ कर न देखा जाए।

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं। सहारा समय, डीडी आंखों देखी, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज़ सहित कई राष्ट्रीय चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य चुके हैं।