एक पागल पूरे देश में घूम-घूम कर चिल्ला रहा था। भ्रष्टचारी दानव! भ्रष्टाचारी दानव! भ्रष्टाचारी दानव! घूमते-घूमते वह दिल्ली आ गया। दिल्ली में उसने देखा वहां एक से बड़े एक पागल थे। कोई भवन बना रहा है तो बनाता चला जा रहा है। कोई बस चला रहा है तो कोई टिकट काट रहा है, कोई शराब बना बेच रहा है। कोई उसे पी रहा है। जिसके पास कोई काम नहीं है वह सरकार बना रहा है बिगाड़ रहा है। सब लोग एक दूसरे का पॉलागन कर रहे हैं। पागल ने भी कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को प्रणाम किया। यह सोचकर कि क्या पता यदि इन लोगों को प्रणाम कर लिया जाए तो ये लोग उस बेचारे मानव को पागल कहना छोड़ दें। परंतु परिणाम तो विपरित ही हुआ। वह पागल उन लोगों की आंखों में चढ़ गया जो सरकार बनाते थे और उस सरकार की हिफाजत करते थे।

एक तरह से वह पागल उन बुद्धिजीवियों के वाद-विवाद का आधार बन गया और अब उनके समक्ष एक ही प्रश्न था कि उस पागल ने पॉलागन क्यों किया, क्योंकि यह कार्य तो बुद्धिजीवी करते हैं, अर्थात जो बुद्धि से जिए वही बुद्धिजीवी! सरकार ने ऐसे बुद्धिजीवियों के लिए एक अनाथालय बना रखा था। जहां खाने-पीने और गप्प करने की भरपूर व्यवस्था थी। वहां शहर भर के बुद्धिजीवी दिन भर, रात भर जमा रहते थे। कोई मदिरा सेवन करता तो कोई उदरपोषण और सब मिलजुलकर बड़े-बड़े पागलों का नाम लिया करते थे। लेकिन वो हतप्रभ थे। ये कैसा पागल है? जो स्वयं को सबसे बड़ा पागल समझता है। उन्होंने उस पागल की छानबीन की तो पता चला कि ये पागल बड़ा पागल है क्योंकि यह भी उन पागलों में से एक है, जो भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा देना चाहते थे। उस पागल को लेकर बुद्धिजीवी पागलों ने एक बैठक की, बैठक का विषय था ‘पागल का पॉलागन’। उस बैठक में कई मतों के पागल उपस्थित थे। उनमें से एक पागल ने कहा ‘साथियों! आज हम सब इस बैठक में यह सुनिश्चित करेंगे कि आज का समय कैसा है? लोकतंत्र में राजा और जनता के बीच कितनी दूरी है। कहीं जनता विद्रोह करने की मुद्रा में तो नहीं है? हम लोग सब कुछ उस पागल के ऊपर शोध करके समझ सकते हैं। जिसने हममें से दो चार बुद्धिजीवियों का पॉलागन किया है।

बैठक में उनके बीच मत मतान्तर हो गया। कुछ का कहना था कि वह पागल है। वह भ्रष्टाचार, भय, और भूख को जनता के बीच से खत्म कर देना चाहता है और यदि ऐसा हो गया तो फिर हमारी लोकतंत्र की राजनीति का क्या होगा? जिसमें प्रत्येक सरकार भय, भूख भ्रष्टाचार द्वारा भय, भूख, भ्रष्टाचार मिटाने के लिए बनाई जाती है। कुछ इस बात पर भड़क उठे! उनका कहना था कि वो तो इन्नोसेंट है। वह ऐसा क्यों करेगा? वो रोटी, सेक्स और सम्मान पा जाए तो वो भी हमारे साथ होगा और फिर हमसे अलग राग नहीं अलापेगा। कुछ ने कहा उसे दिल्ली से भगा दिया जाए तो अच्छा होगा। बैठक समाप्त हुई तो आम राय से यह फैसला लिया गया कि इस पागल को दिल्ली से भगा दिया जाए। सबने समर्थन किया। वह पागल जहां नौकरी करता था वहां से उसे बदनाम करके निकालने के साथ-साथ चारों तरफ यह आदेश दे दिया गया कि इसे अब कोई नौकरी नहीं देगा। एक बुद्धिजीवी ने उस पागल के अब तक कमाए गए पैसे भी चुरा लिए। 8 महीनों तक वह पागल किसी प्रकार जीवित रहा। जब वह बेरोजगारी से त्रस्त हो गया तो ईश्वर की अनुकम्पा से उसे एक जगह नौकरी मिल गई। अब ताकतवर बुद्धिजीवियों के बीच खलबली मच गई।

सभी बुद्धिजीवियों ने अपने राजनीतिक आकॉओं से संपर्क किया। राजनीतिक पागलों ने उनसे पूछा कि आखिर वह पागल ऐसा क्या कहता है? जिससे तुम लोग विक्षिप्त व रुग्ण हो गए हो! तो, उन्होंने कहा- कुछ नहीं। केवल भ्रष्टाचारी दानव, भ्रष्टाचारी दानव! कहता रहता है। राजनीतिक पागल समझ गए कि वह पागल सत्य बोल रहा है। उन्होंने बुद्धिजीवी पागलों को जाने का आदेश दिया। फिर राजनीतिक पागलों ने आपस में मंत्रणा की और यह सुनिश्चित किया कि यदि हम लोग भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने में सफल हो गए तो फिर आगामी सरकार हमारी होगी। सबके चेहरे खिलखिला उठे। दुर्भाग्य देखिए कि यह बात उन पागलों को पता लगा गई जिनके हाथ में सत्ता थी। योजना के मुताबिक उन्होंने एक समाजसेवी पागल को बुलाया और उसे भ्रष्टाचार का भूत भगाने वाला बताना आरंभ कर दिया। रातों रात करोड़ों खर्च करके मीडिया प्रबंधन हुआ। वह समाजसेवी पागल भी औव्वल दर्जे का कलाकार था। उसने मीडिया में किसी कानून की चर्चा की और कहा कि इस कानून से भ्रष्टाचार का भूत भाग सकता है। मीडिया ने श्रमिक की भूमिका निभाई। रातों रात वह समाजसेवी ‘पागल’ जनता का हीरो बन गया क्योंकि उसने सत्ता की बात मानी। अब सत्ता की चाह रखने वाले छटपटाने लगे। उन्होंने भी एक फर्जी पागल का आह्वान किया। यह भी गजब का कलाकार था, परंतु इसे सत्ता का समर्थन प्राप्त नहीं था। जैसे ही मीडिया के श्रमिकों के साथ उसने भ्रष्टाचार के भूत की चर्चा की! देश की जनता को लगा मानो दो मिनट में भ्रष्टाचार मिटने वाला है।

सत्ताधारी कराहने लगे, दिन भर में उनकी चीख निकल गई। उन्होंने अपने सैनिकों से कहा इस ढोंगी पागल का मध्य रात्रि में ऐसा इलाज करो कि भविष्य में फिर कोई भ्रष्टाचार के भूत को बोतल से बाहर न निकाले। कार्रवाई हुई तो सत्ता की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ गईं। अब सत्ता कार्रवाई के पश्चात ढोंगी पागल को बदनाम करना चाहती थी। जिससे जनता दो भागों में बंट जाए ताकि जनतंत्र को विद्रोह का सामना न करना पड़े। मीडिया के उद्योगपतियों का आह्वान किया गया। परंतु क्या पक्ष क्या विपक्ष! मीडिया का रेट चार गुना हो चुका था। सत्ता को ज्यादा राज्यकोष मीडिया पर खर्च करना पड़ा। खैर सौदा तय हो गया। किसी तरह भ्रष्टाचार का भूत बोतल के अंदर घुसाया गया। अब अन्य तरीकों से जनता का मनोरंजन किया जा रहा है। जनता कन्फ्यूज है। उसकी आशा सलवार पहन कर भाग चुकी है।

भ्रष्टाचार का भूत एक यक्ष प्रश्न बन कर पुनः देशवासियों के मध्य उभरा है। सारे पागल पुनः पहले जैसी स्थिति में आ गए हैं। वह पागल जो भ्रष्टाचारी दानव! भ्रष्टाचारी दानव! कहता था। वह भी नौकरी करता है, खाना खाता है, प्रतिष्ठित हो गया है। कभी-कभी रात को जब उसे दौरा पड़ता है। तो वह रोते हुए चिल्लाता है! भ्रष्टाचारी दानव! भ्रष्टाचारी दानव! और फिर सो जाता है। भ्रष्टाचार का भूत प्रतिदिन बोतल के अंदर से उसे मुंह चिढ़ाता है और कहता है कैसे हो पागल मानव! मुझे कोई नहीं मिटा सकता! क्योंकि जो मेरी शरण में आयेगा वही सत्ता पाएगा! और जो मुझे मिटाने आएगा वो खुद मिट जाएगा। बेचारा मानव उस बोतल में बंद भूत से वाक्युद्ध करते हुए लगता है पागल की मौत ही मरेगा। आप मत मरना आप बुद्धिजीवी हैं। बुद्धिजीवी हैं तो रोटी, सेक्स और मान सम्मान के साथ जीवित रह ही लेंगे। मनुष्यता जीवित रहे या ना रहे। बहरहाल देखना यह है कि भ्रष्टाचार उत्पादन और इसके निवारण का नोबल किसे दिया जाता है। मैं तो अभी यह समझने में लगा हूं कि यह लोकतंत्र है या राजतंत्र!

इस व्‍यंग्‍य के लेखक अभिषेक मानव हैं.