नेताजी के यहां चोरी हो गई। शहरभर में तहलका मच गया। कोई पुलिस व्यस्था को कोस रहा था तो कोई चोर की दिलेरी की दाद दे रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि ये मुमकिन हुआ तो हुआ कैसे। कुछ लोग आंख दबाकर इस वाकये पर अपने मुहावरेबाजी के गुप्तज्ञान का खुलासा करते हुए कह रहे थे कि इसे ही कहते हैं-चोर के घर में छिछोर। रिश्वत की सूंघनी सूंघ-सूंघकर उनीदी हुई पुलिस सहसा जाग गई। पुलिस ने अपने परिचित और आत्मीय चोर-उचक्कों को बुलाकर मनुहार करते हुए पूछा- देखो भाई डायन भी सात घर छोड़कर दांव मारती है। तुम लोगों ने तो इतना सौजन्य भी नहीं निभाया। अपने नेताजी के यहां ही हाथ रमा कर दिये। अरे हाथ की सफाई भी करनी हो तो थोड़ा सोच-विचार के काम किया जाता है। बताओ ये किसकी करतूत है।

चोरमंडली ने पुलिस के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा-साहबजी आपकी कसम हम लोगों ने उधर हाथ नहीं डाला है। अगर गलती हो भी जाती तो भूल-चूक लेनी देनी के मुताबिक हम माल आपको वापस कर देते। माना कि हमलोग चोर है, साहब मगर हम लोगों का भी तो कोई स्टैंडर्ड है। नेताओं के यहां हमलोग चोरी नहीं करते। आखिर वे भी तो हमारे ही भाईबंधु हैं। हे पुलिस भाईसाहब, आपकी वर्दी की कसम हमलोगों ने नेताजी के यहां चोरी नहीं की है। पुलिस हैरान, परेशान कि फिर किसने नेताजी के यहां ये कारनामा किया होगा। क्या अब पाकिस्तान की आई.एस.आई. इंडिया में तस्करी और आतंकी घटनाओं के साथ अब चोरी भी करवाने लगी। यानी कि थोक के कारोबारी अब रिटेल में भी उतर रहे हैं। वैसे अगर इस बात को प्रचारित कर दिया जाए कि इस चोरी में किसी विदेशी चोर संगठन का हाथ है तो नेताजी और पुलिस दोनों की इज्जत बढ़ जाएगी। सरकार इस हरकत पर कड़ा ऐतराज जताते हुए एक बयान जारी कर देगी कि पड़ोसी देश को अपनी हरकतों से बाज आना चाहिए। आतंकी संगठनों को बढ़ावा देते-देते वह चोर-उचक्कों को भी भारत में घुसेड़ने लगेगा ऐसी ओछी हरकत करने की तो हम उससे कभी उम्मीद भी नहीं कर सकते थे। और वह भी हमारे देश के नेताओं के बंगलों में। यह सरासर हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है।

वैसे आतंकवादी और चोर-उचक्कों में फर्क सिर्फ तकनीकी शब्दावली का ही है। मूल चरित्र तो दोनों का ही एक होता है। ऐसा भी हो सकता है कि अगली समझौतावार्ता में हमारी सरकार पड़ोसी देश से चोरी गए माल वापस लेने की बात रखकर चोरी गए माल की कई सूचियां उसे थमा दे। सरकार चिंतित हो सकती है यह सोचकर कि क्या फ्यूचर होगा हमारे स्वदेशी चोरों का। अब चोरी भी आउटसोर्सिंग से। देश की आर्थिक स्थिति की तो रीढ़ ही टूट जाएगी। बिन लादेन के मरते ही पाकिस्तान की सरकारी गुल्लक बिलकुल खल्लास हो चुकी है। अमेरिका के अनुदान बंद कर देने पर तो लगता है कि फिर लाहौर और करांची के भिखारी भी पाकिस्तान के इशारे पर दिल्ली और बंबई में भीख मांगेंगे। शायर और गजलकार तो वैसे ही आए दिन इंडिया में ही ठसे रहते हैं। पाकिस्तान के कलाकारों और आतंकियों के लिए हिंदुस्तान बिगबॉस का घर है। जो एक बार घुस गया तो वो तीन महीने से पहले तो बाहर निकलने का नाम ही नहीं लेता। और अगर किसी का नाम अजमल कसाब है तो फिर वह तो जिंदगी भर यहीं की चिकन-बिरयानी मज़े से खाता है।

सुना है कि पड़ोसी देश में चोरों के भी ट्रेनिंग कैंप आई.एस.आई ने खोल डाले हैं और बड़ी तादाद में दुर्दांत चोरों की भर्ती वहां की जा रही है। अच्छी परफारमेंस पर उन्हें पाकिस्तान में छपे भारतीय नोटों की भरपेट स्कॉलरशिप भी दी जाती हैं। अगर कहीं सीमापार के चोरों का नेटवर्क भारत में बिछ गया तो भारत के थाने तो फिर सुलभ इंटरनेशनल के ही काम आएंगे। नहीं ऐसा हम कतई नहीं होने देंगे। पापी पेट का सवाल है। चाहे अपनी जेब से करनी-भरनी पड़े हम नेताजी के माल की बरामदगी, फौरन से पेश्तर करके दिखाएंगे।

इस हास्य-व्यंग्य के लेखक पंडित सुरेश नीरव हैं. पंडित जी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.