अशोक मिश्रआज आपको एक कथा सुनाने का मन हो रहा है। एक गांव में बलभद्दर (बलभद्र) रहते थे। क्या कहा...किस गांव में? आप लोगों की बस यही खराब आदत है...बात पूछेंगे, बात की जड़ पूछेंगे और बात की फुनगी पूछेंगे। तो चलिए, आपको सिलसिलेवार कथा सुनाता हूं। ऐसा हो सके, इसलिए एक पात्र मैं भी बन जाता हूं। ...तो मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। अब आप यह मत पूछिएगा कि मेरा गांव कहां है? मेरा गांव कोलकाता में हो सकता है, लखनऊ में हो सकता है, आगरा में हो सकता है, पंजाब के किसी दूर-दराज इलाके में भी हो सकता है। कहने का मतलब यह है कि मेरा गांव हिंदुस्तान के किसी कोने में हो सकता है, अब यह आप पर निभज़्र है कि आप इसे कहां का समझते हैं।

तो बात यह हो रही थी कि मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। उसी गांव में रहते थे छेदी नाऊ। तब मैं उन्हें इसी नाम से जानता था। उस समय मैं यह भी नहीं जानता था कि 'छेदी बड़का दादा' (पिता के बड़े भाई) यदि शहर में होते तो छेदी सविता कहे जाते। उन दिनों जातीयता का विष इस कदर समाज में नहीं व्याप्त था। तब ब्राह्मण, ठाकुर, पासी, कुम्हार, चमार आदि जातियों में जन्म लेने के बावजूद लोग एक सामाजिक रिश्ते में बंधे रहते थे। तो कहने का मतलब यह था कि छेदी जाति के नाऊ होने के बावजूद गांव किसी के भाई थे, तो किसी के चाचा। किसी के मामा, तो किसी के भतीजा। हर व्यक्ति उनसे अपने रिश्ते के अनुसार व्यवहार करता था। छेदी बड़का दादा को तब यह अधिकार था कि वे किसी भी बच्चे को शरारत करते देखकर उसके कान उमेठ सकें। कई बार वे मुझे भी यह कहते हुए दो कंटाप जड़ चुके थे, 'आने दो पंडित काका को, तुम्हारी शिकायत करता हूं।' पंडित काका बोले, तो मेरे बाबा जी। हां, तो बात चल रही थी बलभद्दर की और बीच में कूद पड़े छेदी। बात दरअसल यह थी कि एक दिन भांग के नशे में यह कथा छेदी बड़का दादा ने मुझे सुनाई थी। और अब कागभुसुंडि की तरह यह कथा मैं आपको सुना रहा हूं।

हां, तो बात यह थी कि मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। उनका एक बेटा था श्याम सुंदर। बाइस साल की उम्र हुई, तो उसे लड़की वाले देखने आये और एक जगह बात तय हो गयी। बात तय होने की देर थी कि बर-बरीच्छा, तिलक आदि कायज़्क्रम भी जल्दी-जल्दी निपटा दिए गए। उन दिनों आज की तरह लड़के का कमाऊपन तो देखा नहीं जाता था। बस, लड़के की सामाजिक हैसियत, जमीन-जायदाद और घर का इतिहास देखा जाता था। आज की तरह लड़कियों को दिखाने का भी चलन नहीं था। तो साहब, मेरे गांव में जो बलभद्दर रहते थे, उनके बेटे के विवाह का दिन आ पहुंचा। आप लोगों को शायद यह पता ही हो कि आज से तीन-तीन साढ़े तीन दशक पहले तक शादी-ब्याह, तिलक, मुंडन, जनेऊ आदि जैसे समारोहों में नाऊ की क्या अहमियत होती थी। शादी के दिन सुबह से ही छेदी की खोज होने लगी थी। दूल्हे की मां कई बार चिरौरी कर चुकी थी, 'भइया छेदी, देखना समधियाने में कोई बात बिगड़ न जाये। मेरा लड़का तो बुद्धू है। तुम जानकार आदमी हो, सज्ञान हो। तुम्ही लाज रखना।'छेदी ने गुड़ का बड़ा सा टुकड़ा मुंह में डालते हुए कहा, 'काकी, तुम चिंता मत करो। मैं हूं न।'

छेदी बड़का दादा की बुद्धि का लोहा सचमुच लोग मानते थे। अगर पिछले एकाध दशक की बात छोड़ दी जाए, तो पंडित और नाऊ को बड़ा हाजिर जवाब और चतुर माना जाता था। छेदी वाकई थे चतुर सुजान। उनकी बुद्धि की एक मिसाल आपके सामने रखता हूं। उन दिनों मैं लखनऊ में पांचवीं में पढ़ता था। गमीज़् की छुट्टियों में गांव जाता था। एक दिन मेरे छोटे भाई के बाल छेदी बड़का दादा काट रहे थे और उनके आगे मैं अपना ज्ञान बघार रहा था, 'बड़का दादा...आपको मालूम है, सूयज़् के चारों ओर पृथ्वी चक्कर लगाती है और पृथ्वी का चक्कर चंद्रमा लगाता है।'

मेरे इतना कहते ही छेदी बड़का दादा खिलखिलाकर हंस पड़े, 'तुम्हारा पढऩा-लिखना सब बेकार है। यह बताओ गधेराम...अगर पृथ्वी सूरज महाराज का चक्कर लगाती है, तो हम सब लोगों को मालूम क्यों नहीं होता। अगर ऐसा होता, तो अब तक चलते-चलते हम लोग किसी गड्ढे में गिर गए होते। हमारे घर-दुवार किसी ताल-तलैया में समा गए होते।'
उनकी इस बात का जवाब तब मेरे पास नहीं था। मैं लाख तकज़् देता रहा, लेकिन वहां बैठे लोग छेदी नाऊ का ही समथज़्न करते रहे। तब सचमुच सापेक्षता का सिद्धांत नहीं जानता था या यों कहो कि ट्रेन में बैठने पर खिड़की से देखने पर पेड़ों के भागने का उदाहरण नहीं सूझा था। खैर...।

बात कुछ इस तरह हो रही थी कि मेरे गांव में जो बलभद्दर रहते थे, उनके बेटे श्याम सुंदर की बारात दो घंटे लेट से ही सही दुल्हन के दरवाजे पहुंच गयी। थोड़े बहुत हो-हल्ला के बाद द्वारपूजा, फेरों आदि का कायज़्क्रम भी निपट गया। इस झमेले में दूल्हा और छेदी काफी थक गए थे। लेकिन मजाल है कि छेदी ने दूल्हे का साथ एक पल को भी छोड़ा हो। वैसे भी उन दिनों दूल्हे के साये की तरह लगा रहना नाऊ का परम कतज़्व्य माना जाता था। इसका कारण यह है कि तब के दूल्हे 'चुगद' हुआ करते थे। ससुराल पहुंचते ही वे साले-सालियों से 'चांय-चांय' नहीं किया करते थे। साले-सालियों से खुलते-खुलते दो-तीन साल लग जाते थे। हां, तो आंखें मिचमिचाते छेदी दूल्हे के हमसाया बने उसके आगे-पीछे फिर रहे थे। सुबह के चार बजे हल्ला हुआ, 'दूल्हे को कोहबर के लिए भेजो।' यह गुहार सुनते ही छेदी चौंक उठे। थोड़ी देर पहले ही दूल्हे के साथ उन्होंने झपकी ली थी। लेकिन बलभद्दर ने जैसे ही दूल्हे से कहा, 'भइया, चलो उठो। कोहबर के लिए तुम्हारा बुलावा आया है।'

छेदी ने जमुहाई लेते हुए दूल्हे के सिर पर रखा जाने वाला 'मौर' उठा लिया और बोले, 'श्याम भइया, चलो।'

जनवासे से पालकी में सवार दूल्हे के साथ-साथ पैदल चलते छेदी नाऊ उन्हें समझाते जा रहे थे, 'भइया, शरमाना नहीं। सालियां हंसी-ठिठोली करेंगी, तो उन्हें कराज़् जवाब देना। अपने गांव-जंवार की नाक नहीं कटनी चाहिए। लोग यह न समझें कि दूल्हा बुद्धू है।'

पालकी में घबराये से दूल्हे राजा बार-बार यही पूछ रहे थे, 'कोहबर में क्या होता है, छेदी भाई। तुम तो अब तक न जाने कितने दूल्हों को कोहबर में पहुंचा चुके हो। तुम्हें तो कोहबर का राई-रत्ती मालूम होगा।'

'कुछ खास नहीं होता, भइया। हिम्मत रखो और करेज़् से जवाब दो। तो सालियां किनारे नहीं आयेंगी।' छेदी दूल्हे को सांत्वना दे रहे थे। तब तक पालकी दरवाजे तक पहुंच चुकी थी। पालकी से उतरकर दूल्हा सीधा कोहबर में चला गया और छेदी कोहबर वाले कमरे के दरवाजे पर आ डटे। घंटा भर लगा कोहबर के कायज़्क्रम से निपटने में। इसके बाद दूल्हे को एक बड़े से कमरे में बिठा दिया गया। रिश्ते-नाते सहित गांव भर की महिलाएं और लड़कियां दूल्हे के इदज़्-गिदज़् आकर बैठ गयीं। लड़कियां हंस-हंसकर दूल्हे से चुहुल कर रही थीं। उनके नैन बाणों से श्याम सुंदर लहूलुहान हो रहे थे। कुछ प्रौढ़ महिलाएं लड़कियों की शरारत पर मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं। तभी एक प्रौढ़ महिला ने दूल्हे से पूछा, 'भइया, तुम्हारे खेती कितनी है?'

सवाल सुनकर भी दूल्हा तो सालियों के नैन में उलझा रहा लेकिन छेदी नाऊ सतकज़् हो गए। उन्हें याद आया कि चलते समय काका ने कहा था, बेटा बढ़ा-चढ़ाकर बताना। सो, उन्होंने झट से कहा, ' बयालिस बीघे....' दूल्हा यह सुनकर प्रसन्न हो गया। मन ही मन बोला, 'जियो प_े! तूने गांव की इज्जत रख ली।'

इसके बाद दूसरी महिला ने बात आगे बढ़ाई, 'दूल्हे के चाचा-ताऊ कितने हैं?'रेडीमेड जवाब तैयार था छेदी नाऊ के पास, 'वैसे चाचा तो दो हैं, लेकिन चाचियां चार।'

यह जवाब भी सुनकर दूल्हा मगन रहा। वह अपनी सबसे छोटी साली को नजर भरकर देखने के बाद फिर मन ही मन बोला, 'जियो छेदी भाई...क्या तीर मारा है।'

पहली वाली महिला ने ब्रह्मास्त्र चलाया, 'और बुआ?'

छेदी ने एक बार फिर तुक्का भिड़ाया, 'बुआ तो दो हैं, लेकिन फूफा साढ़े चार।' यह सवाल सुनते ही दूल्हा कुनमुना उठा। दूल्हे ने अपना ध्यान चल रहे वातालज़प पर केंद्रित किया और निगाहों ही निगाहों में उसे उलाहना दी, 'अबे क्या बक रहा है?' लेकिन बात पिता के बहिन की थी, सो उसने सिफज़् उलाहने से ही काम चला लिया। तभी छेदी बड़का दादा भी सवाल दाग बैठे, 'और भउजी के कितनी बहिनी हैं?'

वहां मौजूद महिलाएं चौंक गयीं। एक सुमुखी और गौरांगी चंचला ने मचलते हुए पूछ लिया, 'कौन भउजी?'

छेदी के श्यामवणज़् मुख पर श्वेत दंतावलि चमक उठी, 'अपने श्याम सुंदर भइया की मेहरारू...हमार भउजी...।' इस बार दूल्हे ने प्रशंसात्मक नजरों से छेदी को देखा। दोनों में नजर मिलते ही छेदी की छाती गवज़् से फूल गयी, मानो कह रहे हों, 'देखा...किस तरह इन लोगों को लपेटे में लिया।'

सुमुखी गौरांगी चंचला ने इठलाते हुए कहा, 'चार...जिसमें से एक की ही शादी हुई है...तुम्हारे भइया के साथ।'

तभी एक दूसरी श्यामवणीज़् बाला ने नाखून कुतरते हुए पूछ लिया,'जीजा जी के कितनी बहिनी हैं।'

छेदी के मुंह से एकाएक निकला, 'दीदी तो तीन, लेकिन जीजा पांच।' इधर छेदी के मुंह से यह वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि दूल्हा यानी श्याम सुंदर अपनी जगह से उछला और छेदी पर पिल पड़ा, 'तेरी तो...' इसके बाद क्या हुआ होगा। इसकी आप ही कल्पना कर सकते हैं। मुझे इसके बारे में कुछ नहीं कहना है, कोई टिप्पणी नहीं करनी है। हां, मुझे छेदी बड़का दादा का यह समीकरण न तो उस समय समझ में आया था और न अब समझ में आया है। अगर आप में से कोई इस समीकरण को सुलझा सके तो कृपा करके मुझे भी बताए कि जब श्याम सुंदर के दीदी तीन थीं, तो जीजा पांच कैसे हो सकते हैं।

इस व्यंग्य के लेखक अशोक मिश्र इन दिनों भोपाल से प्रकाशित होने जा रहे नए अखबार हम वतन के स्थानीय संपादक हैं. ये अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत की अखबारों में काम कर चुके हैं. इनका एक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है और इन दिनों एक उपन्यास के लेखन में व्यस्त हैं.