नीरवसत्यवीरजी का दावा है कि वे कभी झूठ नहीं बोलते और उनके जानने वालों का दावा है कि सत्यवीरजी से बड़ा झूठा उन्होंने अपनी ज़िंदगी में आजतक नहीं देखा है। उनके जन्म को लेकर किंवदंती प्रचलित है कि जिस गांव में सत्यवीरजी का जन्म हुआ वहां सत्यवीरजी के जन्म से ठीक पहले सौ सत्यवादियों का आकस्मिक निधन हो गया था, तब सत्यवीरजी इस पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। इसलिए सौ लोगों की मृत्यु का अपने को जिम्मेदार मानकर इस हादसे के सदमें में सत्यवीरजी इतना गहरे डूब गए कि बचपन से ही इन्हें सत्य बोलने का व्यसन लग गया। जो आज तक बरकरार है। सत्यवीरजी ने तरह-तरह से झूठ बोलकर सत्य बोलने के इस कुटैव से पीछा छुड़ाना चाहा, मगर सत्य ने भी सत्यवीरजी का दामन इतनी मजबूती से पकड़ा हुआ है कि कोई भी तरकीब आज तक काम नहीं आई। सत्यवीरजी का दावा है कि सच बोलने की आदत से वे लाचार नहीं होते, तो झूठ बोलकर कब के दो-तीन बार कैबिनेट मंत्री बन चुके होते।

जुगनू : कुछ बातें बेमतलब 17 : यह बहुत बड़ी घनचक्करी खबर है। अपने आप में यह बड़ी करंट मारने वाली घनचक्करी खबर है। यूं तो ऐसी खबर बिहार में जनमती नहीं क्योंकि यहां चक्कर ही चक्कर होता है कि जो मंत्री न बने वह मंत्री बनने के लिए किसके-किसके दरबार में चक्कर चला रहे हैं। घनचक्कर नहीं होता है। होता है तो सुन समझ कर दिमाग ही घनचक्कर हो जाता है। पता नहीं सीएजी को यह खबर कब लगती और हम यह मान कर चलते कि बिहार राज्य बिजली बोर्ड में पौने छह सौ करोड़ का घाटा दिख जाता। मगर वाह रे घनचक्कर बिहार राज्य विद्युत विनियामक आयोग का कि जिसे बोर्ड ने 578 करोड़ रुपए का घाटा माना, उसे केवल राजस्व घाटा 9 करोड़ बना दिया। यह राजस्व घाटा क्या होता है, इसकी जानकारी कोई निर्वहन कुमार ही दे सकता है। किस्सा कुल जमा इतना है कि विद्युत विनियामक आयोग ने बिजली बोर्ड के उन आंकड़ों को घनचक्करी माना जिसमें घाटा पौने छह सौ करोड़ माना गया था। नियामक आयोग के इस घनचक्कर से फायदा उन्हें हुआ जिनको बिजली मिलती है और बिल भी दे देते हैं। अब बिजली सिर्फ 5 पैसे प्रति यूनिट महंगी होगी। इसकी घनचक्करी में न पड़े कि प्रति यूनिट बिजली कितनी की पड़ती है। अब तो यह निर्वहन कुमार को तय करना होगा कि उनका बिजली बोर्ड इतना घाटा क्यों दिखाता है और उनका ही आयोग उसे खारिज क्यों कर देता है।

नीरवभारत देश ऋषि और कृषि प्रधान देश है। जब ऋषियों की फसल कृषि से भी अधिक होने लगी तो मजबूरी में ऋषियों ने भी कृषि कार्य शुरू कर दिया। इस खेती-बाड़ी के चक्कर में न जाने आजतक कितने ऋषि खेत रहे यह शोध का एक पक्ष है, हमारे ऋषियों का। मगर एक दूसरा पक्ष भी अभी सामने आया है यो यह कि हमारे देश के भूगोल निर्माण में ऋषियों के अंग-प्रत्यंग बहुतायत से प्रयोग में लाए जाते थे। हमारे ऋषि-मुनि भवन निर्माण का बहुत ही लोकप्रिय कच्चा माल हुआ करते थे। संपूर्ण देश के भूगोल निर्माण में ऋषियों के शरीर को चूने-गारे की तरह इस्तेमाल में लाए जाने का व्यापक प्रचलन था। इसीलिए तो किसी शायर ने कहा है कि कुछ बात है ऐसी कि मिटती नहीं हस्ती हमारी। शायर ने इसी विशेष बात की ओर इशारा किया है। जिसकी व्याख्या करते हुए वह कहता है कि- ऋषियों के सिर को कच्चे माल की तरह उपयोग करके जो शहर बनाए गए वो आज भी हमारे ऋषियों के बलिदान की गौरव गाता हैं। सिरपुर, सिरसा, शीशगंज, सरगुजा, सरधना और सरकंडा-जैसे विकसित शहरों के अदभुत सभी माडल सिर से ही बने हैं।

सूरेश नीरव: रिश्‍तों का सुपरपावर देश भारत : ये कितनी नाइंसाफी है कि बेचारा आदमी एक और उसकी जान को रिश्ते अनेक। बेचारा कहां जाए। और कितने रिश्ते निभाए। एक को पकड़ो तो दूसरा मेंढक की तरह उछलकर दूर खड़ा हो जाता है। हम यह तो फिजूल ही कहते हैं कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है। असलियत में तो हमारा देश रिश्ताप्रधान देश है। रिश्तों में दुनिया का इकलौता सुपरपावर देश। पहला रिश्ता देश से। देश हमारी माता है। भारत माता। मदर इंडिया। गाय हमारी माता है। नदियां हमारी माता है। जय गंगा मैया की। जय जमुनाजी की। और-तो-और हमने बीमारियों से भी अंतरंग रिश्ते बनाते हुए चेचक को भी माता कहकर अपनी रिश्ता बनाऊ क्षमता का विश्व में कीर्तिमान स्थापित कर रखा है। एक फिल्मी गीतकार ने तो- 'गंगा मेरी मां का नाम बाप का नाम हिमालय' कहकर अपने खानदान का पूरा बायोडाटा ही सार्वजनिक कर के अपने खानदानी होने का परिचय दिया हैं। वरना तो हमारे यहां मौके के मुताबिक गधे को भी बाप बनाने की गौरवशाली परंपरा रही है। जो आज तलक पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से बिलकुल अछूती है। यह हमारे लिए राष्ट्रीय अभिमान की बात है।

दिनेश चौधरीयद्यपि विपक्ष के उभरते हुए नेता विश्वमित्र को 'सेक्स स्केण्डल' में फंसा देने के बाद इंद्र का आसन काफी सुरक्षित हो चला था, फिर भी अगले आम चुनावों में गद्‌दी बनाये रखने के प्रयोजन से इंद्र ने अपनी छवि बनाने के लिये बड़े घरानों पर छापे डालने शुरू कर दिये। देवराज की यह कार्रवाई धनाढ्‌य व्यवसायी कुबेर के लिये अहितकारी हो सकती थी, अतः काली लक्ष्मी के सदुपयोग के उद्‌देश्य से कुबेर ने अपने निजी सहायक से गहन विचार-विमर्श किया। बहुत सोच-विचार कर निजी सहायक ने कुबेर को एक अखबार के प्रकाशन की सलाह दी और इस संबध में एक नोट-शीट तैयार की। पाठकों की सुविधा के लिये इस नोटशीट को ज्यों का त्यों रखा जा रहा हैः

जुगनू: कुछ बातें बेमतलब 16 : यह एक बहुत बढ़िया विचार है। इस विचार में सब कुछ है सदाचार भी और कदाचार भी। जैसे राजपाट में वापसी के बाद मुख्यमंत्री ने तय किया कि भ्रष्टाचार का अचार बनाया जाए। अचार और खिचड़ी का बड़ा मधुर संबंध होता है। इसी मधुर संबंध पर तो कहावत है कि खिचड़ी के चार यार – दही, पापड़, घी और अचार। अब न बड़े-बड़े भ्रष्टाचार होने लगे हैं। पुराना भ्रष्टाचार तो जन वितरण प्रणाली ही हुआ करता था। किसी जमाने में इसका भी एक कार्ड होता था – राशन कार्ड। इस राशन कार्ड के बिना जीवन अधूरा-अधूरा सा लगता था। इस कार्ड पर सब कुछ मिलता था। सिर्फ वह नहीं मिलता था जो देने का वादा यह कार्ड करता था। अब कार्ड भी आसानी से नहीं मिलता। यह युद्ध क्षेत्र भी हो गया है क्योंकि यह आंकड़ा हो गया है। इस युद्ध क्षेत्र का सबसे बड़ा हथियार आंकड़ा होता है। यह शोध का विषय है कि आंकड़ा सदाचार है या कदाचार या भ्रष्टाचार। आपको तो पता है कि राजपाट ही नहीं, सरकार भी आंकड़े से ही चलती है। बिहार की सरकार भी आंकड़े से चलती है और भारत सरकार भी आंकड़े से चलती है। कभी-कभी भारत सरकार आंकड़े से नहीं चलती है। यह भी कह सकते हैं कि जैसे संसद नहीं चलती है, वैसे ही भारत सरकार भी नहीं चलती है। अभी बिहार सरकार और भारत सरकार में बड़ा भारी आंकड़ा युद्ध चल रहा है। इसमें से एक असत्यवादी है। ऐसा बहुत कम होता है कि सरकार दो हों और असत्यवादी एक हो। सरकार हमेशा असत्य का निर्वहन करती है। उसके पास आंकड़ों का सत्य होता है। यहां भी है। यह बड़ा ही गंभीर विषय है। इसकी गंभीरता के सामने राडिया टेपवाणी कुछ भी नहीं है।

नीरव जीआज सुबह-सुबह शोकसभानंदजी का हमारे मोबाइल पर अचानक हमला हुआ। मैं-तो-मैं, मेरा मोबाइल भी आनेवाली आशंका के भय से कराह उठा। शोकसभानंदजी की हाबी है उत्साहपूर्वक शोकसभा आयोजित करना। हर क्षण वह तैयार बैठे रहते हैं कि इधर किसी की खबर आए और उधर वे तड़ से अपनी शोकसभा का कुटीर उद्योग शुरू करें। वैसे इनको जैसे ही किसी की बीमारी की खबर मिलती है, उनकी बांछे खिल जाती हैं। महीने में यदि पंद्रह से कम शोकसभाएं होती हैं तो खुद शोकसभानंदजी की तबीयत बिगड़ने लगती है। शोकसभाएं शोकसभानंदजी का प्राणतत्व है। मजाल है कोई बड़ा आदमी बीमार पड़े, अस्पताल में भर्ती हो, और शोकसभानंदजी मातमपुर्सी-पर्यटन के लिए उसे देखने न जाएं। बीमार के घर या अस्पताल में आना-जाना शोकसभा के आयोजन का अचूक निवेश है। इससे एक बात की गारंटी हो जाती है कि शोकसभा का ठेका उसे ही मिलेगा और कोई दूसरा नहीं झटक पाएगा।

नीरवहमें गर्व है कि हम हिंदुस्तानी हैं। जहां आज भी परंपराओं को निभाने की परंपरा जिंदा है। भले ही आदमियत मर चुकी हो। पैदा होने से लेकर मरने तक यहां आदमी परंपराओं को निभाता है। सच तो यह है कि यहां आदमी परंपराओं को ही ओढ़ता है औऱ परंपराओं को ही बिछाता है। परंपराएं ही पीता है, परंपराएं ही खाता है। और खुशी की बात ये है कि इन परंपराओं को सबसे पहली गिफ्ट वह अपनी फैमिली से पाता है। भले ही सभ्यता के विकास के साथ-साथ देश में जंगल और परिवार के आकार दोनों ही छोटे हो गए हों मगर हमारी निष्ठाएं इनके आकार की चिंता किए बिना भी बदस्तूर बरकरार हैं। पहले सौ-सौ सदस्यों वाले परिवार और हजार-हजार पेड़वाले जंगल हुआ करते थे। अब दो-या-तीन पेड़ों के जंगल और दो या तीन बच्चों वाले विराट परिवार ही देश की शोभा के लिए रह गए हैं। शरीफों के सर्किल में तो अब पत्नी ही फेमिली का पर्याय हो गई है। आजकल जो भी निमंत्रण आता है उसके एक कोने में विद फेमिली या सपरिवार शब्द का डेकोरेटिव जुमला जरूर लिखा रहता है।

नीरवस्कूली दिनों में मास्साब ने घौंटा लगवा के याद करवाया था कि काल तीन तरह के होते हैं- भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल। सोचता हूं कि काल का कितना अकाल था उन दिनों। बस ले-देकर टिटरूंटू बस तीन ही काल। बस इनी के टेंटू लगाकर घूमो। प्रातःकाल, सांयकाल और रात्रिकाल बस सिर्फ और सिर्फ तीन ही काल। आज देखिए मार्केट में कितनी वेरायटी के काल एबिलेवल है। ट्रंककाल, मिसकाल, एलार्मकाल, हाक्सकाल और जैकाल। बस इनके जवाब में हमें तो अपने भोले-भंडारी महाकाल का ही सहारा दिखाई पड़ता है, वही इनका कचूमर निकाल सकते हैं। मैं अभी भोले भंडारी का भजन करने का मूड बना ही रहा था कि एक सरदारजी की ध्वनि सुनाई दी- पंडितजी सतश्री अकाल। ये थे सरदार कालसिंह बग्गा। हमारे निकटतम पड़ोसी। वो जितने लोकल हैं, उतने ही वोकल हैं। पूछ बैठे- किस खुरपैंच मैं डूबे हो, पंडितजी। मैंने कहा- बचपन में मास्साब ने काल पढ़ाए थे। उनके बारे में ही सोच रहा हूं।

नीरवहम बदनाम भी हुए तो कुछ गम नहीं...चलो इस बहाने नाम तो हुआ। नामचीन होने के तमाम बहाने आजमाने के बाद दुनियाभर के आम आदमी ने सर्वसम्मति से नामचीन होने के लिए बदनाम होने के फार्मूले को ही सबसे सुविधापूर्ण और सम्मानजनक नुस्खा पाया है। इसमें सबसे बड़ा लाभ तो उसे ये होता है कि- वह इंसाफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के- जैसी फालतू, लड़कपन की धमकीभरी चुनौतियों से तत्काल निजात पा लेता है। और ऐसे जुमलों की खिल्ली उड़ाते हुए पूछता है कि जब तमाम सुविधाजनक राजपथ और जनपथ हमारे चलने के लिए सरकार ने बनवाए हैं तो फिर हमें क्या जरूरत है इंसाफ के डगर पर चलने की। और वह भी उस इंसाफ की डगर पर जो कि जब से बनी है तभी से डगर-मगर है। अरे हमें चलना है या सड़क पर ब्रेक डांस करना है। हम दाएं जाएं तो इंसाफ की डगर बाएं जाए। क्या रखा है ऐसी कवायद में। पुराने जमाने में छुआछूत, सतीप्रथा, बालविवाह- जैसी तमाम कुरीतियां तो समाज में थी हीं मगर इससे भी आदमी की तृप्ति नहीं होती थी इसलिए ईमानदारी, सचरित्रता और इंसाफ पर चलने- जैसी कई डिजाइन की आत्म हत्यात्मक प्रथाएं उसने और चला रखी थीं। ये वो दौर था जब स्त्री के सती होने पर और आदमी के हरिश्चंद टाइप दुर्दांत उत्पीड़न करने के बाद ही यश का का टेटू उसके माथे पर गोदा जाता था।

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब -14 : कुछ सवाल बहुत पुराने होते हैं । अकसर यह सवाल नहीं जवाब होते हैं । फिर भी सवाल अपनी जगह पर जमा होता है । जवाब भी जमा सा लचीला होता है । इसमें सब कुछ कसैला होता है । पर यह मीठा होता है । इसमें बड़ा ज्ञान होता है । यह ज्ञान बहुत अज्ञान फैलाता है । जैसे पिछले दिनों हमारे जीरोनुमा हीरो ने एक सवाल बिहार के चुनाव के अपने भाषण में समझाया । यह भी एक सवाल था । कितना बढ़िया सवाल था कि नीतीश कुमार अगर नरेंद्र मोदी विरोधी हैं तो वह भारतीय जनता पार्टी के साथ सत्ता में क्यों हैं ? क्यों का कभी कोई उत्तर नहीं होता क्योंकि यह क्यों ही कभी नहीं होता सत्ता में ईमानदार। सत्ता का जीव धर्म सरकार बचाना होता है । सरकार गठबंधन की होती है तो वह तरह तरह के अंडे सेंकती है । अंडा सेकना क्या है । अंडे को मुर्गी अपनी गर्मी से चूजा बनाती है ।

नीरवहम प्रगतिशील देश हैं। प्रगति हमारी परंपरा है। इसलिए अन्य क्षेत्रों में प्रगति हो यह तो ठीक है, मगर इसके साथ-साथ परंपराओं की भी प्रगति हो, इसका सरकार विशेष ध्यान रखती है। सरकार किसी मुद्दे पर ध्यान दे अपने-आप में यही विशेष होता है मगर सरकार विशेष ध्यान दे  फिर तो यह सुपर विशेष मामला हो जाता है। प्रगति और परंपरा में संतुलित विकास हो, इसलिए सरकार देश को कंप्यूटर और पंयायती राज दोनों की मदद से आगे बढ़ाएगी। सारा-का-सारा पंचायती राज कंप्यूटर में होगा और खुद कंप्यूटर पंचायत के दफ्तर में। जैसे पानी से भरा मटका तालाब में। मटके के बाहर भी जल और भीतर भी जल। कंप्यूटर के बाहर भी पंचायती राज और कंप्यूटर के भीतर भी पंचायती राज। ये कबीरी कंप्यूटर है। देश में पंचायती राज लाने के सारे सरकारी बंदोबस्त हो चुके हैं। सरकार जरूरी अस्त्र-शस्त्रों से पूरी तरह लैस है। वैसे भी संसद और विधानसभा खेलते-खेलते सरकार और जनता को बोरियत-सी हो गई है। कुछ चेंज तो चाहिए ही। इसलिए अब हम सी मिलकर पंचायत- पंचायत खेलेंगे। और फिर हमारी तो संस्कृति ही पंचायत करने की रही है। हमारे तो रोम-रोम में पंचायत बसती है। कुछ अज्ञानी पंचायत को गांव से जोड़कर देखते हैं। यह पंचायत का सरासर अपमान है। पंचायत तो आप शहरों की पाश कालोनी से लेकर खेतों और चौपालों तक सब जगह देख सकते हैं। जहां पांच नर या नारी मिले पंचायत शुरू।

नीरवनारी सशक्तीकरण पर गोष्ठी करने का फैशन समकालीन हिंदी साहित्य की आज सबसे बड़ी उत्सवधर्मिता है। स्त्री-विमर्श के सैंकड़ों केन्द्र आज साहित्य में दिन-रात सक्रिय हैं। जगह-जगह काउंटर सजे हुए हैं। गौरतलब खासियत यह है कि इन जलसों में सबसे ज्यादा भागीदारी पुरुषों की होती है। जैसे मद्यनिषेद्य गोष्ठी में पीने के शौकीन लोग वहां जाने का सतर्क परहेज करते हैं, ठीक वैसे ही इन गोष्ठियों में साधनहीन स्त्रियां शरीक होने से भरपूर परहेज करती हैं। भूले-भटके जैसे मद्यनिषेद्य गोष्ठी में कुछ पियक्कड़ प्रवक्ता भी अपने बहुमूल्य विचारों से जन-जागृति करने का दुर्लभ कार्य करने पहुंच जाते हैं, कुछ उसी अंदाज़ में संयोजक की पसंदानुकूल कुछ क्लबगामिनी स्त्रियां नारियों की दुर्दशा पर भावुक वक्तव्य देकर गोष्ठी को संतोषीमाता की कथा के आयोजन की तरह फलदायी बनाने का पुण्य कार्य करती हैं। बहुत समय पहले मुझे एक ऐसे ही आयोजन में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सौभाग्य इसलिए कह रहा हूं कि जिस आयोजन में गया था उसमें सौभाग्यशाली लोग ही जा पाते हैं। जो जाते हैं और सकुशल लौटकर भी आते हैं।

जुगनू: कुछ बातें बेमतलब - 15 : देश की राजनीति ही नहीं मन और मानसिकता भी ताजा-बासी खाना हो गया है। यह सब कुछ बहुत सारी वजहों से हुआ। बहुत सारी वजहों की तलाश करेंगे तो वजहों तक तो नहीं ही पहुंच पाएंगे – हो सकता है कि चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के विश्लेषक हो जाएं। यह बिरादरी ताजा-बासी खाना खाने और खिलाने में माहिर होते हैं। और क्यों न हों करोड़ों का धंधा है। खैर इस बिरादरी का लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का, बिहार के मामले में 24 नवंबर को रिजल्‍ट सामने आ जाएगा। उसके बाद भी, जब ताजा खाना सामने होगा – यह बिरादरी साबित करती रहेगी कि अभी भी बढ़िया होता है ताजा-बासी खाना। यह अच्छा नहीं लगता कि बिरादरी ने मुझे बिरादरी का नहीं माना है। फिर भी बिरादरी के गुण गाए जाता हूं। अब यह कहना तो उचित नहीं है कि कांग्रेसियों के समान प्रधानमंत्री के ही गुण गाता हूं। या भ्रामक जनता पार्टी के समान कर्नाटक का मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को बनाए – बचाए – हटाए जाने के लिए भ्रामकता के गुण गाता हूं। जहां भी जाता हूं खाता हूं बासी-ताजा खाना।

नीरवमेरी जिंदगी में आजकल परिस्थितियां कुछ इस तरह असहयोग कर रही हैं गोया वे परिस्थितियां न होकर विरोधी पार्टियां हों। सबने मिलकर मेरा बैंड बजा रखा है। फिलवक्त मैं हाईक्वालिटी की परेशानियों से घिरा हुआ हूं। चूंकि मास्टर हूं इसलिए इस बात की तो मुझे तसल्ली है कि भले ही चैन से जी न पाऊं मगर मरूंगा पूरी शान से। क्योंकि औपचारिकतावश ही सही मेरे छात्र मेरे सम्मान में दो मिनट का मौन रखकर, मेरी शोकसभा को जरूर शानदार और यादगार बना देंगे। इस शानदार शोकसभा के सपनों के सहारे ही आजकल जिंदगी काट रहा हूं। छठे वेतन आयोग में अध्यापकों के वेतनमान बढ़ाए जाने की मेरी मास्टरी उपलब्धि को मेरे सगे-संबंधी ऐसे अचरज से देख रहे हैं, जैसे किसी ने उनको किसी किन्नर के यहां पुत्र जन्म की खबर सुना दी हो।

नीरवकल सुबह-सुबह विद्रोहीजी आ धमके। बहुत गुस्से में थे। वह किसी व्यक्ति विशेष से गुस्सा नहीं थे। पूरे देश से वे गुस्सा थे। इतना अखिल भारतीय गुस्सा देखना तो दूर मैंने कभी सुना तक नहीं था। ये तो गनीमत है कि मेरे शाक-एब्जोर्बर्स इतने हाईक्वालिटी के हैं कि मैं उनके इस हाईवोल्टेज गुस्से के झटकों को भी झेल गया। कोई और होता तो विद्रोहीजी उसे ठोंक-पीटकर ही दम लेते। चूंकि उनका गुस्सा पूरे देश से था और मैं इस महान देश का मूल निवासी हूं, इसलिए देश की गुस्सा को देशवासियों पर उतारने का उनका जन्म सिद्ध संवैधानिक अधिकार है। उनके हाथ में एक निर्दोष अखबार था, उसे सामने रखी टेबल पर, नृशंसतापूर्वक पछीटते हुए, नथुने फुलाकर एक करारे डायलाग का झन्नाटेदार प्रहार उन्होंने मुझ पर किया और बोले- भाईसाहब, जब तक इस देश से भाई- भतीजावाद खत्म नहीं होगा, इस देश का कुछ नहीं हो सकता। यहां योग्यता से ज्यादा रिश्तों को तरजीह दी जाती है। ऐसा दुनिया के किसी देश में नहीं होता। मैंने कहा- रिश्ते बनाने की कला भारतीय डीएनए की खासियत है। रिश्तों के रिजर्वेशन फार्म तो उसकी सांसों से लिपटे ही रहते हैं। हर भारतीय काल-समय और परिवेश के मुताबिक सबसे पहले रिश्ता बनाता है।