पंडित सुरेश नीरवन जाने कैसी ये हवा चली है कि आजकल वे लोग ज्यादा परेशान रहते हैं जो कि ईमानदारी से काम करना चाहते हैं। और जो न खुद खाते हैं और न किसी को खाने देते हैं। ईमानदारी के जुनून से त्रस्त ऐसे अधिकारियों के सबसे बड़े दुश्मन वे लोग होते हैं, जो बेचारे दुर्भाग्य से ऐसे अफसर के अंतर्गत काम करते हैं। और जिनकी बेईमानी का कुटीर उद्योग ये खड़ूस अफसर बंद कर देते हैं। खीज मिटाने को ये बेचारे, बिना सहारे, वक्त के मारे कुछ टिटपुंजियां अखबारों में थोड़ा ले-देकर खबरें छपवाते रहते हैं। और अपने मन की भड़ास निकलते रहते हैं।

सुरेशजीअप्रैल फूल नामक त्योहार दुनिया का एक मात्र धर्मनिरपेक्ष, वर्गनिरपेक्ष, क्षेत्रनिरपेक्ष और अघोषित छुट्टीवाला एक ऐसा ग्लोबल त्योहार है, जिस दिन नुकसानरहित मज़ाक के जरिए एक-दूसरे को सार्वजनिकरूप से मूर्ख बनाने का संवैधानिक अधिकार हर आदमी को  फोकट में मिल जाता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इस दिन के अलावा आदमी आदमी को मूर्ख बनाता ही नहीं है। मगर इस दिन जिस भक्ति भाव से आदमी वॉलेंटियरली मूर्ख बनने को उत्साहपूर्वक राजी हो जाता है, उसके इसी मूढ़ उल्लास ने अप्रैल फूल के पावन पर्व को दुनिया का नंबर एक त्योहार बना दिया है। आखिर आदमी इस दिन मूर्ख बनने को इतना उत्साहित रहता क्यों है, इसका जवाब मेरे अलावा दुनिया के किसी समझदार आदमी के पास नहीं है।

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 21 : लोकतंत्र में जनता जनार्दन जी को पटाने के लिए क्या-क्या नहीं होता। कोई एक नाम भी तो नहीं है इनका। आध्यात्मिक विचारवान के लिए यह जनता जनार्दन जी हैं तो भौतिकपन वालों के लिए आम आदमी। अदालत में जनहित याचिका हैं। अखबार में बाबूजीनुमा कार्टून हैं। यह कभी गलत नहीं होते। यह और बात है कि यह गलतियों के भंडार हैं। इन्हें कभी कोई दोष नहीं देता। यह भी दोषियों को अपना समर्थन देते हैं। इनकी गरीबी के बल पर लोग अमीर हो जाते हैं। अपनी गरीबी मिटाने के लिए यह तुरंत बिक भी जाते हैं। सब कुछ इनके नाम पर होता है। इनके पास कुछ नहीं होता। यह जब आम होते हैं तो आम के आम और गुठली के दाम होते हैं। जब यह गुठली के दाम होते हैं तो सभ्य लोगों की जबान में कंज्यूमर कहलाते हैं। संस्कृत में अनुवाद हो कर उपभोक्ता हो जाते हैं। इनमें से काफी लोग भूखे रहते हैं, पर खूब खाने वाले इन्हें पेटू भी कहते हैं।

चैतन्‍य भट्टकितना समझाया था बाबा रामदेव को कि सब कुछ करना पर नेताओं से पंगा मत लेना क्योंकि इनसे उलझना यानी ‘‘बर्र के छत्ते’’ में हाथ डालने जैसा है पर नहीं माने बाबाजी और मांग कर डाली कि विदेशों में जमा काला धन सरकार वापस लेकर आये, जब सरकार ने उनके कहे पर कान नहीं दिया तो बाबाजी ने सीधे-सीधे धावा बोल दिया केन्द्र की सरकार पर कि ये जानबूझकर विदेशों मे जमा काला धन वापस लाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, इसका मतलब कहीं न कहीं दाल में काला ही नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है. बाबाजी का निशाना जहां था जैसे ही वहां तक तीर पहुंचा और तीर की चुभन उनको महसूस हुई तो अपने सेनापतियों को आगे कर दिया.

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 20 : नहीं लगता आपको कि देश का असली वाला शासन प्याज की परत की तरह है। असली वाला शासन केंद्र वाला होता है। राज्य वालों का शासन तो मुंबई महानगर पालिका से भी चिरकुट होता है। समझिए कि राज्यों का शासन प्याज की वह परत होता है जो खाई नहीं जाती, दिखाई जाती है। राज्य को कभी पता नहीं होता कि फसल खराब हो गई है। दरअसल, राज्य को पता भी होता है तो वह इंतजार करता है कि केंद्र सरकार कोई कार्रवाई करेगी। केंद्र सरकार इंतजार करती है कि प्याज की कीमत बढ़ती रहे। प्याज का निर्यात होता रहे। हमारा देश तो शाकाहारियों का देश है प्याज – लहसुन नहीं खाएंगे तो क्या फर्क पड़ता है।

शिबलीवही हुआ जिस का डर सबको था। अंततः सानिया मिर्ज़ा ने पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी शोएब मलिक से तलाक लेने का फैसला कर लिया है। खबर के अनुसार सानिया ने अपने करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों से सलाह मशविरा करने के बाद यह फैसला किया कि उनके लिए यही बेहतर है की वो खुद को शोएब से अलग कर लें। शोएब से अलग होने के बाद सानिया किस से शादी करेंगी यह अभी पूरी तरह से तय नहीं है, मगर आशा है कि वो पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन की बात मानेंगी जिन्होंने सानिया को स्मार्ट क्रिकेटर इरफान पठान से शादी करने का मशविरा दिया है। मगर खुद सानिया इरफान के बजाय ज़हीर खान से शादी करना चाहती हैं, जो इरफान से बेहतर गेंदबाज हैं और टीम में भी बने हुये हैं।

नीरवअपने लपकू चंपक जुगाड़ीजी आजकल रेडियो एक्टिव साहित्यकार हो गए हैं। यूरेनियम-जैसे रेडियो एक्टिव पदार्थ में और रेडियोएक्टिव साहित्यकार में सिर्फ इतना फ़र्क होता है कि रेडियोएक्टिव पदार्थ हमेशा अपनी दम पर सक्रिय रहता है वहीं रेडियोएक्टिव साहित्यकार सिर्फ रेडियो में नौकरी लगने के बाद ही सक्रिय होता है। और जैसे ही रेडियो की नौकरी से हटता है या समारोहपूर्वक हटाया जाता है, वह निर्जीव हो जाता है। गोबर से निकले गुबरैले की तरह। कुछ-कुछ इसी नस्ल के जीव हैं महोदय- लपकू चंपक जुगाड़ीजी। आजकल अपनी लगन में मगन लपकू चंपक जुगाड़ीजी ग्रीक कथाओं के एटलस की ज़िंदगी जी रहे हैं। बिलकुल एटलस की तरह। जैसे उसके कंधे पर पृथ्वी टिकी है, लपकू चंपक जुगाड़ीजी के कंधों पर उसी तर्ज पर हिंदी का संसार धरा हुआ है। साहित्य के भार से चरमराते और ऐसी विषम परिस्थिति में भी मुस्कुराते लपकू चंपक जुगाड़ीजी हिंदी के विकास के लिए पूरे बलिदानी भाव से हथेली पर प्राण लिए सपरिवार पिकनिक मनाते घूम रहे हैं। जब से रेडियो की नौकरी में आए हैं तब से लपकू चंपक जुगाड़ीजी पूरी तरह से कविया गए हैं। उन्हें कविता करने से रोक भी कौन सकता है। अब कविता करना लपकू चंपक जुगाड़ीजी का कुर्सी-सिद्ध अधिकार है। एक तो कवि ऊपर से रेडियो की नौकरी। यानी कि करेला और नीम चढ़ा। मजाल है कहीं, कोई कवि सम्मेलन लपकू चंपक जुगाड़ीजी के बुलाए बिना हो जाए।

देश ने 62वां गणतंत्र दिवस मनाया. हर साल की तरह इस साल भी लोग राजपथ के फूलों के गमले चुराकर घर ले गए, जो कोई गमले नहीं उठा सका, वह जो हाथ लगा वह उठा ले गया. ये देश मेरा है और इसके प्रति मेरा कोई कर्तव्य है. ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है, ये भी सिद्ध हुआ. ये वाक्य हमारे महापुरुष कहते थे. गणतंत्र दिवस की छुट्टी थी फिर भी भारतवासियों ने महापुरुषों की बात मानी और उस पर अमल भी किया. सभी लोगों ने नहीं किया तो क्या हुआ? आधा लोगों ने तो किया. ये देश मेरा है - इस पर अमल करते हुए जो-जो देश का है वो-वो मेरा मानकर तुरंत घर ले गए. आखिर गणतंत्र दिवस के उत्सव से प्रेरणा लेने के बाद उसको अमल भी तो तुरंत किया, रही बात देश के प्रति मेरा कुछ कर्तव्‍य है की, तो वो परसों से देखेंगे क्योंकि 27 जनवरी को फिर छुट्टी जो है.

नीरवबांसुरी प्रसादजी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि ज़िंदगीभर चैन की बांसुरी बजानेवाले बांसुरी प्रसाद की मौत सरकार के जी का जंजाल बन जाएगी। संवेदनशील सरकार का एक कलाकार की मौत पर परेशान होना लाजिमी है। और फिर बांसुरी प्रसादजी तो सरकार के बुलाने पर ही लोक-कला-संगीत के जलसे में भाग लेने के लिए राजधानी आए थे। बांसुरी प्रसादजी़ की ज़िंदगी की ये फर्स्ट एंड फाइनल हवाई यात्रा थी। सरकार के सौजन्य से एक साथ उन्हें पांच सितारा होटल में ठहरने और हवाई जहाज में बैठने का टू-इन-वन प्रसन्नतादायक मौका मिला था। शायद खुशी के हैप्पी लम्हों की इस हैवी डोज़ को बेचारे बांसुरी प्रसादजी झेल नहीं पाए और अपनी जान पर खेल गए। कलाकार थे। और कलाकार तो बेचारे होते ही घोर भावुक हैं। सरकारी खातिरदारी का ज़ोर का झटका उन्हें ज़रा ज्यादा ही ज़ोर से लग गया। अब बांसुरी प्रसादजी तो हैवन सिधार गए मगर सरकार की जान सांसत में डाल गए। पूरा तंत्र परेशान है कि इस राष्ट्रीय आपदा से निबटा कैसे जाए। समस्या एक हो तो उससे निबटें भी मगर यहां तो बांसुरी प्रसादजी की बॉडी पर तो धारावाहिक समस्याएं उछल-कूद कर रहीं हैं।

: बीबी ना होने से चली गई मेरी रेपुटेशन : सुबह 10 बजे ठंड के मारे रजाई से निकलने का मन नहीं हो रहा था। तभी अचानक मेरे फोन की घंटी बजी टाटा के नंबर 9208897615 से मेरे पास फोन आया, पहले तो वो कट गया मतलब कि मिस काल में कर्न्वट हो गया फिर दुबारा आया, मैने समझा कोई दुर्घटना हो गयी है चलो कर लो न्यूज की तैयारी। काल रिसीव करते ही आवाज आई ‘‘गुड मार्निंग सर मैं कोटक महिंद्रा से पूजा बोल रही हूं क्या मैं आप का नाम जान सकती हूं मैंने भी अपना परिचय दिया। उधर से दूसरा जवाब था सर आप सिटी के 500 रेपुटेड लोगों में चुने गए हैं, जिनके काल डिटेल के आधार पर हमने आपसे संपर्क किया है।’’ अपनी रेपुटेशन को देखते हुए मैने भी मोहतरमा का आभार जताया। उन्होंने बात आगे बढ़ाई, ‘‘सर सिर्फ चुनिंदा लोगों में से आपको हमारी कंपनी एक लाख तक का बीमा फ्री में दे रही हैं। आपको दोपहर 3 बजे अपनी बीबी के साथ अमुक जगह पर आना है। एक लाख का मुफ्त बीमा सुनकर तो दिल गार्डेंन गार्डेन हो गया, पर सवाल था बीबी बोले तो लुगाई कहां से लाया जाए। मन में आया कि कोई तैयार हो तो 3 बजे से पहले शादी करके मुफ्त बीमे का लाभ उठाया जाए। फिलहाल जाने क्या सोचकर मैंने मैडम से क्षमा मांगी कि मेरी शादी नहीं हुई है, अगर एक लाख मिल जाए तो शादी कर लूंगा। पर मैंडम ने बड़ी ही बेरहमी से मेरा रेपुटेशन घटाते हुए ‘‘सॉरी’’ कहा और फोन कट हो गया।

नीरवजब से हवासिंह किसी ऊपरी हवा के प्रभाव में आए हैं बेचारे की तो हवा ही खराब हो गई है। और हवा हुई भी इतनी खराब है कि नाक की प्राणवायु और कूल्हे की अपान वायु में कोई भेद नहीं रह गया है। हवा का ऐसा हवाई सदभाव हवाई सिंह-जैसे बिरलों को ही नसीब होता है। शरीर के दोनों सिरों से प्राणायाम करने का जटिल-कुटिल हठयोग हवासिंह की हवाबाजी का ही दुर्लभ नमूना है। कुछ विद्वानों का तो यहां तक कहना है कि भोपाल में जो गैसकांड हुआ था, उसके हाहाकारी यश की जिम्मादारी भले ही यूनियन कार्बाइड ने हथियाली हो मगर उसके मूल उत्पादक अपने हवासिंह भाई साहब ही थे। अब आप तो सभी जानते ही हैं कि क्रेडिट हड़पने के मामले में इन अमेरिकनों का रिकार्ड तो हमेशा से ही खराब रहा है। हल्दी और नीम तक का पेटेंट-अपहरण करने में कभी न चूकनेवाला अमेरिका गैसकांड-जैसे महत्वपूर्ण और अंतर्राष्ट्रीय कारनामें का श्रेय भारत को कैसे लेने देता। वैसे राज़ की बात यह है कि यूनियन कार्बाइड और हवासिंह दोनों ही गैस उत्पादन की सहोदर संस्थाएं रही हैं। एक में गैस उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर होता था और एक में गैस उत्पादन स्वांतः सुखाय होता था। यूनियन कार्बाइड दुर्घटनावश बंद हो गई। मगर हवासिंह संयंत्र आज भी चालू है। गैस लीक करने की अभद्र अमेरिकन शैली भारतीयों को बिलकुल पसंद नहीं आई। इसलिए यूनियन कार्बाइड को बोरिया बिस्तर बांधकर भोपाल से भागना पड़ा।

ईश्वर से विनती यही, है मेरी इस बार।

तुम ऐसे फूलो-फलो, जैसे भ्रष्टाचार।।

येदुरप्पा सा आपका, रुतबा रहे बहाल।

कलमाड़ी बन जीम लें, खुद ही सारा माल।।

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 19 : कुछ कहावतें मजेदार होती हैं। मसलन एक कहावत बहुत ही मजेदार है। नारियां क्षमा करें, यह कहावत उनके खिलाफ है। पर है बहुत मजेदार। नारी, अगर इस कहावत को अपने पर न लें और अलग-अलग रुपकों में इसको समझें तो उन्हें भी मजा आएगा। तो कहावत है कि इयार का गुस्सा भतार पर! अब इसे यूं भी समझ सकते हैं कि हार का गुस्सा ईवीएम पर। या यूं कह सकते हैं कि मनमोहन का गुस्सा योजना आयोग पर। पता सिर्फ यह लगाना है कि मालिक कौन है। यहां भतार मालिक का प्रतीक है और इयार प्रतीक है उसका, जो मालिक की गैर मौजूदगी में एक झलक पाता है। यह झलक क्या है। झलक गृह मंत्रालय है। इसका इयार कौन है पी चिदंबंरम। अगर हमने इयार खोज लिया तो भतार भी खोजना पड़ेगा। बहुत परदे में रहता है गृह मंत्रालय। कुछ कुछ उस गाने की तरह कि परदा जो खुल गया तो फिर...भतार हो जाएगा नाराज। तो भतार श्री बहुत नाराज हैं। दिल्ली में बहुत बलात्कार होता है, उससे बहुत नाराज हैं। आसान लोकतांत्रिक तरीका तो यह था कि दिल्ली पुलिस को दिल्ली की नगरपालिका नुमा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार के जिम्मे छोड़ देते।

महंगाई डायन से जनता परेशान और सरकार हैरान है। जनता इसलिए की बजट गड़बड़ा गया है और सरकार इसलिए की राजनीति कहीं गड़बड़ा न जाए। महंगाई रोकने का सरकारी खेल भी एकदम निराला है। यह न जनता के समझ में आता है और न ही महंगाई डायन को डराता है। महंगाई बढ़ती है। प्रधानमंत्री चिन्ता प्रकट करते हैं। कृषि मंत्री जल्द ही दाम घटने की बात कहते हैं। इतना ही नहीं ज्यादा कुरेदने पर वह आगबबूला हो जाते हैं। अरे भाई। कोई ज्योतिषी थोड़ी न हैं, जो यह बता देंगे की दाम कब कम थमेंगे। विपक्ष सरकार को कोसता है। अर्थशास्त्री मांग और आपूर्ति के खेल में मामले को उलझाकर अपनी विद्ववता का परिचय देते हैं। सरकारी प्रवक्ता राज्यों को जमाखोरों पर नकेल कसने की नसीहत देते फिरते रहते हैं। और विपक्षी प्रवक्ता पानी पी पी कर सरकार को कोसते हैं। इन सबके के बीच इस नाटक में जनता और परेशान नजर आती है। पहले बढ़ते दामों से और बाद में नेताओं के इस नाटक से। वह ना थोक मूल्य सूचकांक को समझती है और न ही उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का मतलब जानती है। उसे तो यह भी नही पता कि बार बार ऐसा क्यों कहा जाता है कि पहले जुलाई फिर नवंबर और बाद में मार्च तक खाद्य आधारित महंगाई 5.5 तक आ जाएगी। दुर्भाग्य से उसे असली सवालों का जवाब कभी नही मिलता।

शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 18 : आज कल देश में अमेरिका विरोध कम हो गया है। वरना जिस बात पर वामपंथी दल बंद करा देते थे, उस पर भारत सरकार औपचारिकता निभा देती है। संघ परिवार के लोग तो इसे देश की प्रतिष्ठा और महान भारतीय संस्कृति से जोड़ कर न सही दिल्ली, बंगलुरु – भोपाल तो बंद करा ही सकते थे कि भारत की प्रतिष्ठा की नाक कट गई। यहां हमेशा इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या भारत की प्रतिष्ठा की कोई नाक भी है। इस पर भी बहस हो सकती है कि वह सिर्फ नाक है या प्रतिष्ठा वाली नाक है। अगर नाक कट गई तो क्या प्लास्टिक की नाक नहीं लग सकती है। फिर असली नाक कटी है या मुहावरे वाली नाक कटी है। कोई यह भी कह सकता है कि अमेरिका में तो भारत की नाक न जाने कब से कट रही है। पर अबकी बार नाक कटने का बहाना साड़ी है। यहां यह भी कहा जा सकता है कि साड़ी स्त्रियां पहनती हैं, हम भारतीय स्त्री को कहां इस काबिल मानते हैं कि उसकी नाक कटने पर हमें तकलीफ हो, इस लिए कट जाने दो अमेरिका में नाक। हमारे यहां देखो हमने साड़ी की कितनी इज्जत बना दी है। हमारे यहां से मतलब मध्य प्रदेश है। यह भारत का हृदय प्रदेश है। यह हृदय प्रदेश भी नाक वाली ही बात है। वरना है तो यह बीमारु प्रदेश में से ही एक। अब तो इसके पास नाक भी नहीं है क्योंकि इसका एक नाक बाघ यहां बहुत खतरे में है।

मैं हूं आम आदमी... सरकार का मारा...मेरी आवाज़ सुनो... दर्द का राज सुनो... फ़रियाद सुनो। मनमोहन सिंह जी, आप तो सुनो... कुछ जवाब दो। जी हां, मैं इसी मुल्क का बाशिंदा हूं, जहां मुकेश और अनिल अंबानी रहते हैं। पहले मुकेश ने तारों से बातें करने वाला दुनिया का सबसे महंगा घर ' एंटिला' 4500 करोड़ खर्च करके बनाया और अब अनिल बड़े भाई से बड़ा घर बनवा रहे हैं। मेरा नाम तो आपको पता नहीं है, हां, वो घर जब बनकर तैयार होगा, तो उसका नाम ज़रूर जानेंगे। और क्या पूछा आपने, मैं कहां रहता हूं? अरे साहब, छोटे-छोटे कमरों में, कहीं झुग्गियों में, तो कभी पाइप लाइन में...क्यों? क्योंकि मैं आम आदमी हूं। अनिल अंबानी का घर 150 मीटर ऊंचा होगा और मेरा...? सच कहूं—मैंने बड़े ख्वाब देखने छोड़ दिए हैं। घर का ख्वाब बड़े सपनों में ही शामिल है। सुना है, एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंकों ने फिर से ब्याज दर बढ़ा दी है। एक ने 0.75 फीसदी का इजाफा किया, तो दूसरे बैंक ने 0.50 प्रतिशत दर बढ़ा दी। यही वज़ह है कि होम लोन महंगा हो गया है। अब जिन लोगों ने फ्लोटिंग रेट पर होम लोन लिया होगा, उनकी हालत पूछिए...। पसीना छूट रहा है। यही वज़ह है कि मैं अपना घर जैसी सोच को सपनों में भी नहीं आने देता।