पंडित सुरेश नीरवनृत्य हमारी परंपरा है। यक्ष, किन्नर, मरुत, देवी-देवता और-तो और भूत-पिशाच तक की नाचना एक प्रबल-प्रचंड हॉबी है। देवराज इंद्र के दरबार में तो नृत्य के अलवा भी कोई काम होता हो इसकी पुख्ता जानकारी कहीं नहीं मिलती। चौबीस घंटे बस नृत्य का अखंड आयोजन होता रहता है। मेनका, तिलोत्तमा, रंभा, संभा और उर्वशी-जैसी तमाम नर्तकियों की शिफ्टें बदलती रहती हैं। एक थके तो दूसरी मौजूद। नच वलिए का 24 घंटे का लाइव टेलीकास्ट इंद्रलोक से होता रहता है। इंद्र का डांस डिपार्टमेंट बड़ा तगड़ा है। पल-पल की खबर रहती है, इसे।

सुरेश नीरवजब से सुना है कि बाबा की जान को खतरा है अपनी तो जान ही सांसत में है। वैसे तो मोर्चे पर तैनात सैनिक और अनशन पर डटे नेता की जान हमेशा खतरे में ही रहती है। पर यहां तो मामला बाबा का है। हमने अपने एक मित्र को सूचना दी कि अपने भ्रष्टाटाचार भगाऊ बाबा की जान खतरे में है तो वह शैतान बड़ी ज़ोर से हंसा। फिर बोला- उमराव जान, गौहर जान-जैसी जानें नवाबों के तो हुआ करती थीं अब बाबाओं के भी होने लगीं। हमने तुनकते हुए कहा- तुम्हें तो हर वक्त दिल्लगी ही सूझती रहती है। कभी सीरियस भी रहा करो। बाबा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। वे अब राष्ट्र की धरोहर बन चुके हैं। और तुम हो कि दिग्गी राजा की तरह फिकरेबाजी पर उतारू हो। अरे उनकी हिफाजत हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।

संजीव चौहानएक ओर अकेले बाबा (रामदेव).... दूसरी ओर पूरी सल्तनत (सरकार)। फिर भी बाबा है, कि सरकार के लिए 'बम' साबित हो रहे हैं। कल तक बाबा के दवाखानों, दवा-कारखानों में जानवरों की हड्डियों के इस्तेमाल का शोर मचाया जा रहा था। देश में कई जगह बाबा और उनकी दवाइयों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन हुए। मुद्दा संसद में गूंजा। सरकार को समर्थन देने वाले कुछ दल और उनके कारिंदे डटे हुए थे। बाबा की गिरफ्तारी की मांग पर। बाबा के दवाखाने बंद कराने पर उतारु थे। समय बाबा के साथ था। एक मुसीबत आयी, तो उससे बचने के दो रास्ते भी निकल आये। बाबा और उनकी दवाईयां 'सर-ए-बाजार' नीलाम होने से बच गयीं। या यूं कहें कि बाबा की आबरु 'बे-परदा' होने से बच गयी। चीखने-चिल्लाने वाले भी हार-थककर शांत हो गये। बाबा की दुकान जैसी पहले चल रही थी, विरोध के बाद और जोर-शोर से चलने लगी। यानि बे-वजह की 'पब्लिकसिटी' फोकट में हो गयी। बाबा और उनकी दवाओं की।

सुरेश नीरव आजकल कालेधन की वापसी को लेकर लोगों में एक अजीब-सी खब्त सवार हो गई है। जिसे देखो वही कालेधन की वापसी को लेकर नथुने फुला रहा है। और-तो-और साधु, बाबा और योगी तक जो कभी धन को विकार और धिक्कार मानते थे आज कालेधन और सफेद धन के लपड़े में पड़कर अपनी इज्जत का जुलूस निकलवा रहे हैं। हद हो गई दादागीरी की। अरे भाई अगर मुकद्दर से किसी के पल्ले सात फेरे देकर कालाधन पड़ भी जाए तो आप सार्वजनिक रूप से उसकी निजी संपत्ति मांगने लगेंगे। अब अपनी जिंदगी के खूंटे से चालीस साल से बंधा कालाधन जिसे हम प्यार से कल्लो कहते हैं, हमारी कुल जवानी का मूलधन है, जो दो बच्चों के ब्याज की शक्ल में परिवार के आंगन में मंहगाई की तरह खूब फूल-फल रहा है।

अशोक मिश्रआज आपको एक कथा सुनाने का मन हो रहा है। एक गांव में बलभद्दर (बलभद्र) रहते थे। क्या कहा...किस गांव में? आप लोगों की बस यही खराब आदत है...बात पूछेंगे, बात की जड़ पूछेंगे और बात की फुनगी पूछेंगे। तो चलिए, आपको सिलसिलेवार कथा सुनाता हूं। ऐसा हो सके, इसलिए एक पात्र मैं भी बन जाता हूं। ...तो मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। अब आप यह मत पूछिएगा कि मेरा गांव कहां है? मेरा गांव कोलकाता में हो सकता है, लखनऊ में हो सकता है, आगरा में हो सकता है, पंजाब के किसी दूर-दराज इलाके में भी हो सकता है। कहने का मतलब यह है कि मेरा गांव हिंदुस्तान के किसी कोने में हो सकता है, अब यह आप पर निभज़्र है कि आप इसे कहां का समझते हैं।

हम, माँ भारती के सपूत ''अमर शहीद नाथूराम गोडसे जी''  के वैचारिक वंशजों का, एक मात्र उद्देश्‍य है केन्द्र में सरकार बनाना। इस उद्देश्‍य की प्राप्ति के लिए हमारे ''परिवार ने''  देश के सबसे बड़े एवं प्रभावशाली बाबा को माध्यम बनाया पर केन्द्र की जलनखोर सरकार ने आंसूगैस के गोले छोड़कर रामलीला मैदान को जबरदस्ती खाली करवा लिया। पुलिस ने क्या, क्यों और कितना किया ये हम गोडसेवादी, देश की जनता को अपने हिसाब से बताने को स्वतंत्र हैं। हमारे बाबा जी,  ''भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव जैसे बुजदिलों'' के विपरीत अगर खून पसीने से बनाये अपने साम्राज्य को बचाने/ भोगते रहने के लिए स्त्री अवतार धारण कर बेवकूफ जनता को मर्यादा पुरूषोत्तम के भरोसे छोड़कर चुपके से निकल लेते है तो इस देश के बुद्धिजीवियों, मीडिया, राजनैतिक दलों और आम आदमी को क्यों तकलीफ हो रही है।

सरकार ने एक बार फिर पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर दुनिया के देशों के सामने अपने इंडिया की नाक ऊंची कर दी। जब भी कभी सरकार को लगता है कि देश की नाक नीची हो रही है वह पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर उसे ऊंचा कर देती है। अपने देश की जनता भी सरकार के इस देशभक्तिपूर्ण कृत्य से भली-भांति परिचित है। देश की नाक ऊंची करने के इस धर्मनिरपेक्ष ढंग को वह खूब पसंद करती है। उसके लिए ये सरकारी हेप्पी मोमेंट्स होते हैं। इसलिए पेट्रोल की कीमतें बढ़ने पर कहीं कोई हल्ला-गुल्ला नहीं होता। जनता जानती है कि ले-देकर सरकार देशहित में एक अदद यही तो काम करती है। जो विपक्ष में बैठे हैं उनका मन भी ललचाता रहता है ये सोचकर कि कब कुर्सी मिले और कब वे पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर देशहित का पुण्य कमाएं।

सुरेश नीवरबाबा कालेधन के सख्त खिलाफ हैं। वो विदेश से कालाधन वापस मंगाकर ही छोड़ेंगे। बाबा का गुस्सा बड़ा अहिंसक है। बाबा बड़े गुस्से में हैं। लीजिए गुस्से में बाबा सरकार को धमकाने सीधे दिल्ली ही पहुंच गए। अबला सरकार भी बाबा के गुस्से के आगे थर-थर कांपने लगी। उसने अपने दूत बाबा के पास छोड़ दिए। दूतों ने गुस्साए बाबा से कहा-बाबा गुस्से में काम खराब हो जाता है। थोड़े कूल-कूल माहौल में मिल जुलकर कोई डील कर लें। बाबा हुंकारे-डील अपनी जगह है और गुस्सा अपनी जगह। मामला कालेधन की वापसी का है। सरकार डील कर लेगी तो हम इस बात पर गुस्सा होंगे कि हमसे डील क्यों की। और अगर डील नहीं की तो हम इस बात से गुस्सा होंगे कि क्या हमारा डील-डौल इतना भी नहीं कि सरकार हमसे डील न करे। हम हठ योगी हैं। सरकार के दूतों ने पैर पकड़ लिए। और मन ही मन बुदबुदाए कि बाबा अगर तुम गुरू हो तो हम भी गुरूघंटाल हैं।

विनोद विप्‍लव: ढिबरी चैनल का घोषणा पत्र - भाग 5 : जैसा कि पहले बताया गया है कि हमने अपने पूज्य पिता जी ढिबरी लाल के नाम को रोशन करने के लिये ढिबरी चैनल खोलने की योजना बनायी है। इस चैनल को शुरू करने के लिये हमने अपनी अंटी से एक ढेला लगाये बगैर ही करोड़ों रुपयों का इंतजाम कर लिया। जब यह तय हो गया कि ढिबरी चैनल शुरू करने और चलाने में पैसे की कोई नहीं आयेगी, बल्कि छप्पर फाड़ कर पैसों की बरसात होगी, तब हमने चैनल चलाने के संबंध में कुछ नियम बनाये ताकि भविष्‍य में इसमें काम करने वाले लोगों को दिशा-निर्देश मिलता रहे।

सुरेश नीरवइश्क की दुनिया में महबूबा सरकार कहलाती है। जो अपने आशिक पर बड़े ही जुल्म ढाती है। मेरा तो मानना है कि सरकार कैसी भी हो, कहीं की भी हो सियासत की हो या मुहब्बत की हो जुल्म ही ढाती है। और यदाकदा, सुविधानुसार अपने चाहनेवाले को तबीयत से पिटवाती भी है। पिटनेवाले को कभी नाराज नहीं होना चाहिए, उसे तो खुश होना चाहिए कि कोई तो है जो उसे इतनी शिद्दत से चाहता है। वैसे भी कहा गया है कि सोना जितना तपता है उतना ही निखरता है। रामदेव बाबा दिल्ली गए ही थे तप करने। पुलिस की पिटाई सरकारी योग में तप ही कहलाती है। सरकार की यही कसौटी है सोने को परखने की। बाबा खुशनसीब हैं कि सरकार ने उन्हें सोना समझा। ओ मेरे सोना रे सोना खफा मत होना रे। आप तो सरकारी टकसाल से सोना होकर निकले हो। बिल्कुल हॉलमार्क सोना।

पत्रकार और पत्र की दुनिया! कितनी अजब है ये, आइये हम ले चलते है आपको इसी दुनियां में, इससे पहले हम आपको बता दें कि कुछ अंग्रेजी और हिन्दी के मिश्रित शब्दों की वजह से कैसे हुआ बेचारा एक पत्रकार। हम कर रहे हैं पत्रकार का शब्द विच्छेद। इसी तरह कुछ और शब्दों का यहां पर अर्थ का अनर्थ होते देखा जा सकता है। पर आप भ्रमित न हो, सिर्फ यह देखिये कि हो क्या रहा है। आधी इंग्लिस और आधी हिन्दी ने कैसे फेर दिया एक नौनिहाल पत्रकार के आशाओं पर पानी। यही है हिन्गलिश की जबानी? पत्र की दुनिया, कौतुहल चमक और ग्लैमर आदि से भरपूर है। नवागन्तुक यहीं सोचता है न, यहां आज के परिदृश्य में पत्रकार का अर्थ शायद बेचारे को यही समझ में आया।

संजीव चौहानभ्रष्टाचार मिटाने और विदेशी बैंकों में जमा काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करवाने की जिद पर अड़े "बाबा से बम" बने रामदेव को आम आदमी के बीच देखकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सांसे रुक गयीं। ठीक वैसे ही, जैसे किसी आदमी के पैरों के नीचे से अचानक "काला-नाग" आर-पार निकल जाये। बिना डसे हुए। हुकूमत को बाबा भी "बम" और "काले-सांप" से कम नज़र नहीं आ रहे। वो बम जो जनता के बीच फट जाये, तो भी सरकार की फजीहत। वो काला-नाग जिसे मारने में पाप लगेगा और देखकर रोंगटे खड़े हो रहे हैं। नहीं मारा तो इस बात का डर, कि न मालूम कब, कहां, किसको डस बैठे?  परेशान-हाल सरकार को एक बाबा दो रुपों में एक साथ नज़र आ रहा- बम और सांप। दोनों ही एक से बढ़कर एक खतरनाक। एक के फटने से तबाही। तो दूसरे के डसने से।

विनोद विप्‍लव : ढिबरी चैनल का घोषणा पत्र- भाग 4 :  शिक्षा मंत्री के सदवचनों एवं सुझावों के बाद हम उत्साह से भर गये और हमें ढिबरी चैनल परियोजना का भविष्य अत्यंत उज्ज्‍वल नजर आने लगा। इस भविष्य को और अधिक चमकदार बनाने के लिये हम देश की एक प्रमुख पीआर कंपनी की मालकिन के पास गये,  जिसका नाम वैसे तो कुछ और था लेकिन हम अपने लंगोटिया यारों की निजी बातचीत में हम उसका जिक्र रंडिया के नाम से ही करते थे,  क्योंकि उसका काम इसी तरह का था। जब वह हमारे संपर्क में थी, तब वह अपने को रंडिया कहे जाने पर कोई शिकायत नहीं करती थी, बल्कि उसे इस नाम से पुकारे जाने पर खुशी होने लगी और बाद में उसने अपना नाम भी यही रख लिया। देखने में वह इतनी सुंदर थी कि उस पर किसी का भी दिल आ सकता था - चाहे वह कितना ही संत हो।

सुरेश नीरवऱाष्ट्रकुल खेलों में भरपेट भ्रष्टाचार का खेल खेलने के बाद भ्रष्टाचार मिटाओ का खेल आजकर देश में काफी लोकप्रिय हो रहा है। जिसे मौका मिलता है नही भ्रष्टाचार मिटाने पर आमादा हो जाता है। मीडिया भी क्रिकेट के बाद भ्रष्टाचार मिटाओ की लुभावनी झांकी को दिखाते हुए छलक-छलक जा रहा है। और लोगबाग भी बड़े श्रद्धा भाव से इस झांकी के देवताओं को निहारते हुए, राजनेताओं को गरियाने के अखंड कीर्तन में लगे हुए हैं। मीडिया जिस उत्साह से पहले संसार में प्रलय ला रहा था उसी आस्था के साथ अब वो भ्रष्टाचार मिटाने में जुट गया है। तिहाड़ जेल में पिकनिक मना रहे भ्रष्टाचार के सिद्ध खलीफा बड़े मुदित भाव से इस आयटम को लाफ्टर शो की जगह देख-देखकर अट्टहास कर रहे हैं।

चैतन्‍य भट्टचलते-चलते अचानक ही भ्रष्टाचार से मुलाकात हो गई. मैंने देखा उसका गुलाब के फूल सा खिला चेहरा काला और मुरझा सा गया था,  चेहरे पर परेशान और हैरानी के भाव साफ दिखाई दे रहे थे. मुझे लगा कल तक जो भ्रष्टाचार हमेशा चहकता-दहकता छाती ठोंक कर चला करता था एकाएक ही कैसे इतना निरीह सा हो गया. मैने उससे पूछ ही लिया,  ''क्या बात है भाई भ्रष्टाचार तुम काफी परेशान और चिन्तित से लग रहे हो बात क्या है? मैंने तो तुम्हें हमेशा हंसता, मुस्कुराता, उत्साह से भरा हुआ देखा है पर आज.''

मियां मसूरी बाहें चढ़ाए/सीना ताने आते दिखाई दिए। मैंने उन्हें आवाज दी-क्यों खां, लपर-झपर करत कहां जा रिये हो? मियां ने मुझे घूरा, फिर लरजती-गरजती आवाज में बोले- 'लेखक महोदय; दिल्ली जा रिया हूं...आप भी हमारे साथ तशरीफ लाएंगे?'  मैं भांप गया कि मियां ने पलटवार किया है। मैंने तीर छोड़ा- 'अमां खां दिल्ली तो दिलवालों की है, अब इस उमर में आप जैसे लोग वहां जाकर क्या करेंगे?' मियां बिदक गए- 'लेखक महोदय, आप हर बात को हल्के में लेते हैं?' मैंने व्यंग्य कसा-'क्यों करूं...महंगाई ने कमर तोड़कर रख दी है, सो भारी-भरकम चीजें उठाने का साहस/दुस्साहस अब हमारे वश में नहीं है!' मियां ने आखें तरेरी- 'महोदय, चीजों से मेरा मतलब उपभोग की वस्तुओं से नहीं; आपके नजरिये से है।' मेरा लहजा थोड़ा मजाकिया हो चला- 'क्यों खां, कहीं आप शशांत शाह के निर्देशन में बनी फिल्म चलो दिल्ली...देखने तो नहीं जा रहे?'