राजकुमार देखो भाई, यदि आपने भ्रष्टाचार नहीं किया हो तो लगे हाथ यह सौभाग्य पा लो और बहती गंगा में हाथ धो लो। फिर कहीं समय निकल गया तो फिर लौटकर नहीं आने वाला है। भ्रष्टाचार की अभी खुली छूट है, जब जैसा चाहो, कर सकते हो। बाद में जाने मौका मिलेगा कि नहीं, कहीं पछताने की नौबत न आए। फाइलों की सुरंग से बारी-बारी एक-एक भ्रष्टाचार का दानव बाहर निकलकर आ रहा है, ये इतने शक्तिशाली हैं कि इन पर हाथ डालने से कतराना पड़ता है और जब दबाव में उसकी कमीज से मक्खी उड़ा भी लिए और वह जेल की चारदीवारी में पहुंच गया तो वहां भी मौज ही मौज? कहीं से नहीं लगता कि वह भ्रष्टाचारी जेल की रोटी तोड़ रहा है। उसे तो जेल ऐसी लगती है, ' घर से दूर-घर जैसा'।

सुरेश नीरवहादसे हमारे देश की लाइफ लाइन हैं। हादसों के बिना मुर्दा है हमारा देश। हादसे नहीं होते तो ज़िंदगी नीरस हो जाती है। वो तो भला हो भगवान का कि जब-तब बाढ़ और अकाल लाकर थोड़ी चहल-पहल देश में ला देते हैं। वरना इन आतंकवादियों के भरोसे तो कुछ भी नहीं होने का। इससे तो हमारा पांच साल का वो प्रिंस ही अच्छा था जो बोर वैल में गिरकर ऊंघते हुए खबरिया चैनलों के कैमरों की आंखों में चमक ले आया था। लगता है कि आतंकवादी आतंकवाद का पार्ट टाइम जॉब करते हैं। होलटाइमर होते तो इतने इतने दिन का गैप होने का सवाल ही नहीं उठता। आतंकी वारदात होती है तो देश में जोश का माहौल बनता है।

सुरेश नीरवसमाज सेवी बदलीरामजी के नागरिक अभिनंदन का धुआंधार जलसा बड़े जोर-शोर से आज संपन्न हुआ। शहर के स्थानीय लोग इसे जिले स्तर का कामनवेल्थ गेम मान रहे हैं। सारा प्रशासन शासन के कंधे-से-कंधा मिलाकर बदलीरामजी के सम्मान सर्कस को सफल बनाने में जुटा रहा। बदलीरामजी का पराक्रम है ही कुछ ऐसी डिजायन का कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो बदलीरामजी की समाज सेवा का अखंड यज्ञ निर्बाध गति से चलता ही रहता है। औग आज भी चल रहा है। बदलीरामजी की समाज सेवा का जलवा आज तक कभी पचास ग्राम भी कम नहीं हुआ। और उस पे तुर्रा ये कि समाज सेवा के लिए बदलीरामजी को कभी समाज के सामने नहीं जाना पड़ता, समाज खुद बदलीरामजी को ढूंढता हुआ उनके पास पहुंच जाने को ललायित रहता है।

सुरेश नीरवजूते भी बड़ी अजीब चीज़ हैं। ये पैदा तो पैरों के लिए होते हैं मगर जुगाड़ लगाकर पहुंच पगड़ी के देश में जाते हैं। ठीक उन भारतीयों की तरह जो पैदा तो इंडिया में होते हैं मगर नागरिकता अमेरिका की पाने को हमेशा ललचाते रहते हैं। और कुछ हथिया भी लेते हैं। अपने मकसद में ये फेल बहुत कम होते हैं। क्योंकि या तो जूते के जोर पर या जूते चाटकर समझदार लोग अपना काम निकाल ही लेते हैं। सिर पे धरा जूता और अमेरिका में रह रहा भारतीय बराबर के इज्जतदार होते हैं। जूते का पराक्रम है ही अदभुत। जूता शक्तिमान है। जूते की बड़ी शान है। कभी कृषिप्रधान हुआ करता था भारत आजकल बाकायदा जूता प्रधान है। जहां हर तरह की प्रधानी जूते के ज़ोर पर ही मिलती है।

पंडित सुरेश नीरवआज के दौर का सबसे ताकतवर प्राणी-दलाल है। सतयुग के जंगलों में जो शौर्य कभी डायनासौर का हुआ करता था,  कलयुग के सभ्य समाज में वही जलवा दलाल का है। इस प्रजाति के जीव की आज यत्र-तत्र-सर्वत्र पूजा होती है। यह किसी पद पर नहीं होता मगर नाना प्रकार के पद इसके पद में साष्टांग दंडवत करते हैं। जायज-नाजायज सभी प्रकार के काम यह चुटकियों में करा देने का हुनर रखता है। इसीलिए तो दलाल की धर्मनिरपेक्ष पूजा होती है। सभी मजहबों के अनुयायी इसकी दिव्य सत्ता को स्वीकारते हैं। और अपनी कामना की पूर्ति के लिए इसे भेंट-पूजा चढ़ाकर प्रसन्न करते हैं।

नीरवनेता तो हमारे देश में आजादी से पहले भी हुआ करते थे और आजादी के बाद भी हो रहे हैं। फर्क इतना है कि पहले होते थे, अब हो रहे हैं। हैं। मगर लोगों का मानना है कि आजादी से पहले के नेता बड़ी हाई क्वालिटी के हुआ करते थे। उंचे विचारोंवाले ऊंचे लोग। आज नेता की डिजायन बदलकर ओछे विचार और छोटे लोगोंवाली हो गई है। बोंसाई नस्ल के लोग। मिनी-मिनी, लघु-लघु। कभी नेताजी का संबोधन रिस्पेक्टकारक हुआ करता था। नेताजी मतलब सुभाष चंद्र बोस। आजाद हिंद फौज। आज किसी शऱीफ आदमी को नेता कह दो तो आजाद हिंद फौज का खयाल तो नहीं आता गोया फौजदारी की नौबत जरूर आ जाती है।

सुरेश नीरवसम्मान की ठरक एक ऐसी सनातन ठरक है जिससे आदमी कभी मुक्त नहीं हो पाता है। उसे जिंदा रहते तो क्या मरणोपरांत भी सम्मान की ललक बनी रहती है। और इसे पाने के लिए नन्‍हा-सा आदमी नाना प्रकार के जुगाड़ करता है। वह हर क्षण-हर पल यही सूंघता रहता है कि उसे सम्मान कहां-कहां से और कैसे-कैसे मिल सकता है। बड़े प्यार से मिलना सबसे दुनिया में इंसान रे न जाने किस जुगाड़ के जरिए मिल जाए सम्मान रे। इसी मंत्र को जपते-जपते जब हमारे श्रीयुत खबीस घुसुरभेदीजी के शरीर के टायर बुरी तरह रिटायर होने लगे तो उन्होंने भी इसी लालसा में अपने भूमिगत प्रयासों के जरिए एक साहित्यिक संस्था की अध्यक्षता हथिया ली।जोड़तोड़ के लिए प्रतिबद्ध, चमचागीरी के लिए वचनबद्ध और षडयंत्रों से संबद्ध खबीस घुसुरभेदीजी अध्यक्ष बनते ही अब अपने आप को अदब की सियासत का मुगलेआजम समझने लगे हैं।

नीरवबातों की महिमा न्यारी है। बात की बात में से बात निकल आती है। असली बात पर कोई पते की बात नहीं करता मगर बात निकलती है तो बिना बात ही बहुत दूर तक चली जाती है। और बिना रुके चलती ही चली जाती है। कश्मीर के मुद्दे पर पिछले साठ साल से हमारी सरकार पाकिस्तान सरकार से लगातार बात कर रही है। कुछ भी नया नहीं हुआ। सरकारें बोर होने लगीं। थोड़ा मूड बदलने के लिए अब बातों के गुलदस्ते में उन्होंने आतंकवाद को भी जोड़ लिया है। पर असली बात तो वही है और वहीं-की-वहीं है। दोनों देशों के बात बनाने में माहिर नेशनल लेबल के बतोड़ खिलाड़ी बात करने जाते हैं। और बात करके चले आते हैं। कुछ दिनों बाद सरकारी चबूतरे बदल जाते हैं। दिल्ली की जगह बात इस्लामाबाद में होने लगती है। शायद चबूतरे बदलने से ही बात बन जाए मगर बात फिर भी नहीं बनती। लेकिन क्या करें। समस्या का समाधान भी तो बातों से ही निकलेगा।

सुरेश नीरवलाइट के मामले को कभी लाइटली नहीं लेना चाहिए। खासकर के यूपी और बिहार के लोगों को। क्योंकि उनके लिए तो लाइट से ज्यादा सीरियस मामला कोई और होता ही नहीं है। कई-कई दिनों बाद लाइट के दर्शन होते हैं। और होते हैं तो एक दिन में कई-कई ये कोई दिल्ली मुंबई थोड़े ही है जो एक बार लाइट आ गई तो फिर जाने का नाम ही नहीं लेती। अपुन के शहर में तो लाइट एक दिन में कई-कई बार आती है। क्योंकि आती भी कई-कई दिन बाद ही है। इसलिए लोगों के जहन में हर वक्त लाइट की ही खयाल रहता है। बात-बात पर लाइट के ही जुमले उछालते रहते हैं। ज़रा कोई सजा-धजा दिखा तो तड़ से डॉयलाग पेल दिया-बड़ी लाइट मार रहे हो। और अपनी किसी नखरैल माशूका के नकचढ़ेपन की तारीफ में कसीदे काढ़ने का मन हुआ तो कह दिया- अरे वो तो छूते ही करेंट मारती है।

सुरेश नीरवकौन चाहता है कि वो कभी-कभी हादसे की चपेट में आए। मगर हादसे भी आदमी के मन की परवाह कब करते हैं। उनका जब मन होता है, जहां मन होता है, जिस पदार्थ, वस्तु या शख्स पर मन होता है उसे अपनी चपेट में लेकर उसे अनुग्रहीत कर देते हैं। वैसे भी हादसों के लिए तो आदमी महज़ पदार्थ ही होता है। इसलिए हादसे ही आदमी का शिकार करते हैं। आदमी कभी हादसे का शिकार नहीं कर पाता। आदमी हादसा-चपेटधर्मी है। वो कितनी भी लकड़घोघो कर ले उसे एक-न-एक दिन हादसे की चपेट में आना ही होता है। इसलिए समझदार लोग हादसे से रिक्वेस्ट करते हैं कि प्लीज आना मेरे घर आना मगर चुनाव के आसपास के मौसम में आना। क्योंकि तब हादसे उत्सव हो जाते हैं। सरकार और प्रतिपक्ष दोनों की आंखों का तारा होते हैं- हादसे।

राजकुमार बाबागिरी का कमाल अभी चहुंओर छाया हुआ है। अब लोगों को समझ में आ गया है, गांधीगिरी में भलाई नहीं है, बल्कि बाबागिरी से ही तिजोरी भरी जा सकती है। गांधीगिरी से केवल आत्मा को संतुष्ट किया जा सकता है, मगर बाबागिरी में करोड़ों कमाए बगैर, मन की धन भूख शांत नहीं होती। जब से इस बात का खुलासा हुआ है कि देश का एक बड़ा बाबा महज कुछ बरसों में करोड़पति बन गया तथा अभी अरबों की संपत्ति का और राज खुलना बाकी है, उसके बाद तो हम जैसे लोग बाबागिरी की तिमारदारी में लगे हुए हैं। बरसों कलम खिसते रहो, लेकिन इतना तय है कि इन बाबाओं की तरह किसी भी तरह से करोड़पति-अरबपति नहीं बन सकते।

पंडित सुरेश नीरवमैंने जबसे पढ़ा है कि चेहरा चरित्र की किताब होता है तब से ही सोच रहा हूं कि जिनका चरित्र नहीं होता है क्या उनके चेहरा ही नहीं होता। और बिना चेहरेवाला शख्स मुझे आज तक कोई दिखा ही नहीं। हां एक-एक चेहरे पर कई-कई चेहरे लगाने वाले जरूर मिले। यानी कि आज के दौर में चेहरा किताब नहीं अच्छी खासी लाइब्रेरी हो गया है। और जिनके चेहरे किताब थे उन को पढ़ने वाले फेस रीडर खुद ही फेसबुक हो गए। चेहरा-चाल और चरित्र का मामला है ही बड़ा टेढ़ा। फेस की असलियत फेस करने पर भीतर की तमाम गोपनीय चीज़ें यकबयक सरफेस पर आ जाती हैं।

बृजेश ज़ीसस- का राम सुने कि तुमरे भक्त को पुलिस उठा ले गई.

राम- देखो ज़ीसस, अभी मूड बहुत डिस्टर्ब है. मज़ाक मत करो.

ज़ीसस- का हुआ, रेडी देखने नहीं चलना है क्या?

नीरवजीभ्रष्टाचार मिटाना ही होगा। देश को भ्रष्टाचार से जब तक मुक्त नहीं कराया जाएगा तब तक देश तरक्की नहीं कर पाएगा। भ्रष्टाचार हटाओ समिति की बैठक में चंपालालजी बोल रहे थे। आज चंपालालजी-जैसे देश के हर जागरुक नागरिक की चिंता भ्रष्टाचार हटाने की है। चंपालालजी उससे अछूते कैसे रह सकते हैं। और वो भी तब जब कि दो महीने पहले ही घोर घोटालों की बदौलत विभाग से उन्हें ससम्मान निष्काषित किया गया हो। निष्कासन के बाद से ही वे खूंखार किस्म के ईमानदार हो गए हैं। लोग उनके पास जाने से डरते हैं। और इस डर के मारे ही लोगों ने उन्हें भ्रष्टाचार हटाओ संस्थान का अध्यक्ष बना डाला।

बृजेश आज सामने एक सज्जन बैठे थे. गले में प्रेस का पट्टा लटकाए. ध्यान से देखा तो उस पर संस्थान का नाम लिखा था मां न्यूज. मैंने कहा कि साला ये कौन सा नाम है मां न्यूज. बगल में बैठे साथी से कहा कि देखो जिसको जो मन कर रहा है वही नाम अपने संस्थान का रख दे रहा है. उन्होंने मां न्यूज रखा है, कल कोई बाप न्यूज रखेगा, परसों देवर, जेठानी भौजाई, पड़ोसन, साला,आदि नाम रखे जाएंगे.अभी मैं बोल ही रहा था कि मां न्यूज वाले सज्जन ने मुझे टोका. कहा, देखिए ज़नाब आप मां न्यूज का मजाक उड़ाएं इस पर मुझे गंभीर आपत्ति है.

नीरवमैं और मेरे जैसे देश के तमाम चवन्नी छाप आजकल भयानक राष्ट्रीय सदमें में हैं। सरकार ने अचानक चवन्नी की नस्ल को खत्म करने का जो जघन्य पराक्रम किया है उसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। और इतिहास-वितिहास से हमें क्या लेना-देना। हम कोई हिस्ट्रीशीटर हैं क्या। हां, हम चवन्नीछाप लोग जरूर इस सरकार को कभी माफ नहीं करेंगे। समाज में ले-देकर टुटरूंटूं इक चवन्नीभर की हैसियत तो हुआ करती थी हमारी, सरकार ने उसकी भी वाट लगा दी। हमलोगों के पास अब क्या बचा रह गया। हम तो महाभारत के मणिविहीन अश्वत्थामा होकर रह गए हैं। चेहरे पर जो कभी चवन्नी की दिव्य चमक से हमारी शख्सियत दिव्य हुआ करती थी, वह चवन्नी ही हमसे छीन ली। बुरा हो इस सरकार का। महाबुरा हो।