छोटे शहरों के लोगों के लिए बड़े सौभाग्य की बात होती है कौन बनेगा करोड़पति जैसे प्रोग्राम में शरीक होने का। इस नाचीज़ हास्य कवि प्रकाश प्रलय को इत्तेफाक से यह मौका मिला। पूरे उत्साह के साथ अमिताभ बच्चनजी के सामने हॉट सीट पर ऊंट-सी गर्दन उठाकर मैं जा बैठा। अपनी बुद्धि के अनुसार मैंने प्रश्नों के जवाब भी दिए। अंधे के हाथ बटेर लग चुकी थी मतलब कि 25 लाख रुपए तक मैं जीत चुका था। मगर फिर एक सवाल पर मेरी बुद्धि की सुई अटक गई। अमिताभजी ने पूछा कि आप किसी से मदद लेना चाहेंगे। तो मैंने कहा- जी हां..। मैं पंडित सुरेश नीरव से मदद लेना चाहूंगा। उन्होंने पूछा कि आप श्योर हैं कि आपको वो सही समाधान दे पाएंगे।

आजकल अखबार और खबरिया चैनल खबरों के कम मनोरंजन के केन्द्र ज्यादा बने हुए हैं। राजनेताओं के साफ-सुथरे और पारदर्शी फूहड़पन को जितनी चुस्ती-फुर्ती से ये लोग जन-गण-मन तक पहुंचाते हैं उसका हरेक पाठक को तहेदिल से ही नहीं तहे दिमाग से भी आभारी होना चाहिए। सरकार की संवेदनशीलता और आंकड़ों की योगसाधना से लैस हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था अक्सर ऐसा मंजा हुआ मज़ाक करती रहती है कि भूखे पेटवाले को भी ऐसे मज़ाक याद करके हंसी आ जाती है। बल्कि जब कभी हमारे देश का आम आदमी दुखी होता है तो वह इन सरकारी लतीफों को याद कर-करके फूट-फूटकर हंस लेता है। पूरा बिग बॉस का घर है हमारी सरकार। जहां से चौबीस घंटे लॉफ्टर शो का लाइव टेलीकास्ट चलता रहता है। जोड-तोड़ के लिए प्रतिबद्ध, झूठ बोलने के लिए वचनबद्ध और नाना प्रकार को घोटालों से संबद्ध अपनी सरकार की अभद्र हेकड़ी पर देश की जनता को आदमकद नाज़ है।

भ्रष्टाचार प्रधान हमारा देश आजकल अन्ना प्रधान देश हो गया है। गूंगे भी अन्ना की प्रशंसा में धाराप्रवाह बोल रहे हैं। धाराप्रवाह बकवास में माहिर नेता गैस पर रखे कुकर में उछलते आलूओं की तरह अन्ना के समर्थन में भ्रष्टाचार को कोसने की प्रतियोगिता में वीरता चक्र हासिल करने पर आमादा हैं। और-तो-और भिखारियों की मंडली में भी फीलगुड की भावनाएं हिलोरें मारने लगी हैं। फुटपाथ पर बैठकर भीख मांगने और रात में सोने तक के लिए पुलिसवालों को पैसे देने पड़ते थे। जिन्हें बैठकर भीख मांगने के लिए ठीया नसीब नहीं था उन्हें जनगणना की ड्यूटी पर लगे सरकारी मास्टरों की तरह घर-घर जाकर भीख मांगनी पड़ती थी। वे भी इस गोल्डन सप्ताह में ठप्पे से रामलीला मैदान जाकर दो टाइम भरपेट इज्जत की रोटी तो क्या तबीयत से तरह-तरह के माल उड़ा रहे हैं।

एक पागल पूरे देश में घूम-घूम कर चिल्ला रहा था। भ्रष्टचारी दानव! भ्रष्टाचारी दानव! भ्रष्टाचारी दानव! घूमते-घूमते वह दिल्ली आ गया। दिल्ली में उसने देखा वहां एक से बड़े एक पागल थे। कोई भवन बना रहा है तो बनाता चला जा रहा है। कोई बस चला रहा है तो कोई टिकट काट रहा है, कोई शराब बना बेच रहा है। कोई उसे पी रहा है। जिसके पास कोई काम नहीं है वह सरकार बना रहा है बिगाड़ रहा है। सब लोग एक दूसरे का पॉलागन कर रहे हैं। पागल ने भी कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को प्रणाम किया। यह सोचकर कि क्या पता यदि इन लोगों को प्रणाम कर लिया जाए तो ये लोग उस बेचारे मानव को पागल कहना छोड़ दें। परंतु परिणाम तो विपरित ही हुआ। वह पागल उन लोगों की आंखों में चढ़ गया जो सरकार बनाते थे और उस सरकार की हिफाजत करते थे।

अगर अन्नाजी का जादू चल गया तो देख लेना भारत में एक दिन ऐसा भी आएगा कि भ्रष्टाचार की बातें सिर्फ कहानी-किस्सों में पढ़ने को ही रह जाएंगी। बच्चे परी कथाओं की तरह पढ़ा करेंगे कि बहुत समय पहले भारत में भ्रष्टाचार नाम का एक दैत्य हुआ करता था। जिसने बड़ा उत्पात मचाया हुआ था। मौका मिलते ही वह तैंतीस करोड़ देवी-देवताओंवाली इस पवित्र-पावन भूमि पर निवास करते ऋषि-मुनियों की संतानों को भ्रष्टाचार के वशीकरण मंत्र से दबोच लेता और उनसे रिश्वत,घोटाले-जैसे मनचाहे गलत-सलत काम करवा लेता। भोले-भाले नागरिक-तो-नागरिक सरकार तक इस भीषण दैत्य के वशीकरण में आकर खुद बदनाम होती और देश को भी बदनाम करा देती। अभिनेता, नेता, अफसर और व्यापारी ही नहीं सिद्ध साधु-संत तक इसकी चपेट में आ जाते।

भारत अतीत में सोने की चिड़िया हुआ करता था। हमलावरों ने इसे खूब लूटा। हालत इतनी पतली हो गई कि बाल-बच्चों की तो बात क्या इंडिया के राष्ट्रपिता तक लंगोटी में आ गए। लंगोटी भी अपने चरखे के दम पर। फिर वो दिन आया जब ईमानदार शासन, स्वच्छ प्रशासन और योजना आयोग के कठोर अनुशासन की बदौलत देश सोने का कबूतर बन गया। कबूतर इसलिए बना क्योंकि मुश्किल को सामने खड़ा देखकर सिर्फ कबूतर ही आंखें बंद कर सकता है। भारत को ऐसे ही लोटन कबूतर से प्रेरणा मिलती है। इसी की बदौलत भारत फिर आज सोने की लंका नहीं सोने का इंडिया बन गया। फुटपाथ से लेकर बंगलों तक अमीरी ही अमीरी बिखर गई। गरीबी क्या होती है ये जानने आम भारतीय स्विटजरलैंड या अमेरिका-जैसे गरीब मुल्कों में जाने लगे। सन 2011 में तो भारत की अमीरी संपन्नता की कुतुबमीनार पर उछल कर जा बैठी।

नीरवदाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ मतलब ये हुआ कि किसी को अगर आध्यात्मिक बनाना हो तो सबसे पहले उसे दाल भक्षण कराना पड़ेगा। दाल खाते ही उसके शरीर में करीने से फिट भजन का सॉफ्टवेयर अपने आप एक्टिव हो जाता है और प्राणी प्रभु के गुण ऑटोमेटिकली गाने लगता है कि है करुणानिधान प्रभु तुसी बड़े ग्रेट हो जो इस कड़क मंहगाई में भी दाल खाने को कुछ दाने सेंक्शन कर ही देते हो। दाल की तासीर होती ही बड़ी धार्मिक है। इसीलिए तो मंदिरों के प्रसाद में चने की दाल और गुड़ निशुल्क बंटता रहता है।

नेताजी के यहां चोरी हो गई। शहरभर में तहलका मच गया। कोई पुलिस व्यस्था को कोस रहा था तो कोई चोर की दिलेरी की दाद दे रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि ये मुमकिन हुआ तो हुआ कैसे। कुछ लोग आंख दबाकर इस वाकये पर अपने मुहावरेबाजी के गुप्तज्ञान का खुलासा करते हुए कह रहे थे कि इसे ही कहते हैं-चोर के घर में छिछोर। रिश्वत की सूंघनी सूंघ-सूंघकर उनीदी हुई पुलिस सहसा जाग गई। पुलिस ने अपने परिचित और आत्मीय चोर-उचक्कों को बुलाकर मनुहार करते हुए पूछा- देखो भाई डायन भी सात घर छोड़कर दांव मारती है। तुम लोगों ने तो इतना सौजन्य भी नहीं निभाया। अपने नेताजी के यहां ही हाथ रमा कर दिये। अरे हाथ की सफाई भी करनी हो तो थोड़ा सोच-विचार के काम किया जाता है। बताओ ये किसकी करतूत है।

सुरेश नीरवपता नहीं किस एंग्रीमैन दुर्वाशा के शाप से सौभाग्यभक्षिणी कर्कशा कुमारी हिडंबा को कविता लिखने का दंड मिला था। यह पता तो नहीं चला मगर उनके इस गोपनीय दंड के कारण सार्वजनिकरूप से शहर का संपूर्ण साहित्य-जगत दंडकारण्य जरूर बन गया था। कविता के आर्यजनों ने इस कवयित्री के कोप से भयभीत होकर गोष्ठियों में आना-जाना ही बंद कर दिया था। गोष्ठी की ख़बर सूंघकर ही कुमारी हिडंबा गोष्ठी में धमक जातीं जहां उनके रौद्ररूप और खूंखार प्रतिभा को देखर शहर के शब्दऋषि या तो ऑन द स्पॉट बेहोश हो जाते या फिर भागकर ऐसे भूमिगत हो जाते जैसे रेडएलर्ट की घोषणा के बाद आतंकवादी हो जाते हैं। कर्कशा देवी की एक अदद गोष्ठी की हाजिरी ही सिटी को गोसिटी बना देती। पता नहीं किस पाप लग्न में कर्कशा देवी ने कवयित्री होने का क्रूर निर्णय लिया था।

मुझे शक है कि मैं दिन-ब-दिन शक का शौकीन होता जा रहा हूं। पहले शायद ऐसा नहीं था मगर फिर सोचता हूं तो शक होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं था कि शक का शौक मुझे बचपन से ही हो और मैंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया हो। अब तो हालत यह है कि मुझे शक पर भी शक होने लगा है कि कहीं ये शक हकीकत तो नहीं है। शक का ही दूसरा नाम शंका है। इस शंका का भी कुछ अलग ही खेल है। शंका लघु शंका होती है तो मुझे शक होता है कि कहीं ये शंका दीर्घ शंका तो नहीं है। और मैं उसे लघु शंका ही समझ रहा होऊं। जब कोई आदमी लघु शंका को भी दीर्घ शंका मान बैठे तो शंका में भी इस बात की आशंका रहती है कि इस शंका का समाधान कहां और कैसे होगा। सुलभवाले वैसे तो काफी काम कर रहे हैं मगर फिर भी लघु या दीर्घ शंका के समाधान में आदमी को आत्मनिर्भर ही रहना चाहिए।

नीरव शिक्षा और भैंस का संबंध पुराणकाल से ही फसल और खाद तथा सूप और सलाद की तरह घनिष्ठ रहा है। ये बात और है कि हमारा अपना व्यक्तिगत संबंध शिक्षा के साथ वैसा ही है जैसा कि भट्टा-पारसौल के किसानों का संबंध बिल्डरों के साथ। अगर ज़मीन किसान की जायदाद है तो शिक्षा हमारी जायदाद है। हमारी ज़मीन पर पुश्तैनी भैंसों का तबेला चलता था,  अब जिसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर हो और जिसके पास नकद पचास भैंसें हों तो वो तो दुनिया के सभी पढ़े-लिखे लोगों से एक अक्षर ज्यादा का ज्ञानी हुआ कि नहीं। क्योंकि दुनिया के किसी भी भाषा में वर्ण सिर्फ उनचास ही होते हैं। और हमरे पास भैंसें थीं पूरी पचास।

पंडित सुरेश नीरवपता नहीं इस देश से भ्रष्टाचार कब जाएगा। बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे ही नहीं अब तो हमारे मुसद्दीलाल तक इस समस्या से परेशान हैं। और सरकार है कि जो भी इस मुद्दे के खिलाफ आवाज उठाता है, वह उसे ही भ्रष्टाचारी बताने में लग जाती है। बाबा-तो-बाबा, दूध के धुले बालकिशन तक फर्जी हो गए इस सरकार की नज़र में। बालकिशन की डिग्री नकली। बालकिशन की नागरिकता नकली। चोर कहीं का। चला था देश का कालाधन वापस मंगवाने। सरकार ने बाबा की लंगोटी और बालकिशन की पोल दोनों ही बड़ी विनम्रता के साथ खोल दीं।

सुरेश नीरव किताब से जिसका इतना-सा भी संबंध हो,  जितना कि एक बच्चे का चूसनी से तो वह समझदार व्यक्ति पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम से जरूर ही परिचित होगा। भले ही वह इस कार्यक्रम की बारीकियां न जानता हो। यह कार्यक्रम लेखक क्यों करता है और कैसे-कैसे करता है इसकी केमिस्ट्री का उसे भला कैसे ज्ञान हो सकता है। अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाने का काम ऑन ड्यूटी तो बिजली विभाग के लोग करते हैं मगर स्वेच्छा से साहित्यकार नामक जीव ही इसे करता है। और जब बिजली का आविष्कार नहीं हुआ था तब तो अंधेरे से उजाले में ले जाने की होलसोल जिम्मेदारी साहित्यकार की ही थी। इस सनातन ड्यूटी को निभाते हुए मैं इस सांस्कृतिक क्रियाकरम पर खूब तेज़ रोशनी डाल रहा हूं।

भ्रष्टाचार से लड़ने में कमजोरी बहुत आ जाती है। इसीलिए तो हमारे राजनेता भ्रष्टाचार से बच निकलने में ही भलाई समझते हैं और पिछले 64 साल से इससे बचते ही नहीं चले आ रहे हैं बल्कि उससे दोस्ती का रिश्ता बनाकर उसे फलने और खुद के फूलने का मौका निकालते रहे हैं। दोनों में कितना भाईचारा। इस के सूत्र से बंधकर सब-के-सब मौसेरे भाई। आखिर भ्रष्टाचार का विरोध किस मुंह से करें। पूरे चौसठ साल की पक्की दोस्ती। अभी-अभी एक अंग्रजीदां बबुआ ने तो पूरे बारह दिन लगाए भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने और मुंह खोलने में। रोज़ रियाज़ करके भी बेचारे अपना पाठ जब याद नहीं कर पाए तो जिसने लिखा था उसीके पन्ने को उठाकर पढ़ गए। क्या पढ़ा इसका उन्हें तो क्या पूरे देश को कोई मतलब समझ में नहीं आया। हां इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को पढ़ते-पढ़ते कहीं बबुआ चक्कर ना खा जाएं इसलिए मदद के लिए उनके बलसखाओं की मंडली-तो- मंडली खुद बहनिया भी मोर्चे पर तैनात रहीं।

नीरवसब शरीर धरे के दंड हैं। इसलिए जब भी किसी स्वर्गीय का भेजे में खयाल आता है तब-तब मैं हाइली इन्फलेमेबल ईर्ष्या से भर जाता हूं। सोचता हूं कितनी मस्ती में घूमती हैं ये आत्माएं। जिंदगी का असली मजा तो दुनिया में ये आत्माएं ही उठाती हैं। न गर्मी की चिपचिप न सर्दी की कंपकंपी। क्या एअरकंडीशंड मस्तियां हैं इनके मुकद्दर में। होनी भी हैं। क्योंकि अब इनके मुकद्दर की ड्राफ्टिंग ब्रह्मा के बाबू चित्रगुप्त ने नहीं लिखी है। अब ये मुक्त ब्रह्मांड विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का आनंद उठा रही आत्माएं हैं। मगर क्या करें हम तो अभी शरीर में हैं। हमें तो सारे भोग भोगने ही हैं। जबसे मेट्रो में चलने का दिहाड़ी व्यसन अपुन को लगा है माथे पर चिंता की रेखा की जगह मेट्रो की येलो लाइन-रेडलाइन उभरने-मिटने लगी हैं और थोबड़ा भी मेट्रो के टिकट-टोकन की तरह चिकना और गोल होता जा रहा है।

: अनशन के बाद का प्रलाप : जनता को अपनी औकात में रहना चाहिए। ये सरासर गुंडागर्दी है कि कुछ सड़किए भीड़ जमा करके एक अदद अनशन की दम पर अकड़कर हमें हुक्म दें कि फलां बिल पास करो, फलां विधेयक लाओ और अभी लाओ। किसने दे दिया इन्हें ये अधिकार। अरे इनकी औकात बस इतनी ही है कि ये हमें वोट दें, हमें जिताएं और अगले पांच साल तक हमारे सामने पूंछ हिलाएं। ससुर हम पर ऑर्डर झाड़ेंगे। जनसेवक हम अपने को क्या कह दिए, ये तो हमारे सिर पर चढ़कर ही भांगड़ा करने लगे हैं। अन्ना की औलाद कहीं के। सर पर टोपी लगा ली और कहने लगे कि मैं अन्ना हूं। अरे राजनीति आखिर राजनीति है। कोई बच्चों का खेल नहीं। और अगर बच्चों का खेल है भी तो यह सिर्फ हमारे बच्चों का खेल है। हम लोग दिनभर समाजसेवा में लगे रहते हैं।