तारकेश कुमार ओझा

बचपन में एक फिल्म देखी थी ... कालिया। इस फिल्म का एक डॉयलॉग काफी दिनों तक मुंह पर चढ़ा रहा... हम जहां खड़े हो जाते हैं... लाइन वहीं से शुरू होती है। इस डॉयलॉग से रोमांचित होकर हम सोचते थे... इस नायक के तो बड़े मजे हैं। कमबख्त को लाइन में खड़े नहीं होना पड़ता। इस नायक से इतना प्रभावित होने की ठोस वजहें भी थी। क्योंकि लाइन में खड़े होने की तब की पीड़ा को हमारी पीढ़ी ही समझ सकती थी। तथाकथित राशन  - केरोसिन मिले या न मिले। लेकिन हर हफ्ते लाइन में खड़े होना ही पड़ता था। एक बार कार्ड पर दस्तख्त कराने तो दूसरी – तीसरी बार छटांक भर सामान आदि लेने के लिए।

क्या थे, क्या हुए हम और क्या होंगे अभी? .... एक प्रार्थना सभा के दौरान सामने पेड़ पर एक लंगूर उछल कूद मचाये हुए था। वह पेड़ जिसे महात्मा गान्धी ने 1936 में रोपा था, लंगूर इस इतिहास से अपरिचित है, वह नहीं जानता कि जिन टहनियों और पत्तियों को तोड़ कर वह पेड़ नश्ट कर रहा है उन्हें बचाया जाना चाहिए। हमारा यह पूर्वज अभी भी आत्म रक्षा, पेट, सेक्स और अपनों के बीच वर्चस्व से अधिक कुछ नहीं जानता और हम हैं कि जाने-अन्जाने अपने अपने हिसाब से बौद्धिक, कलात्मक, आध्यात्मिक, नैतिक, राजनैतिक, आर्थिक भूख पैदा कर लिया है जिसे हम सभ्यता कहते हैं।

परसाई जी अपने गुरु हैं। ये बात और है कि अपन कभी भी उनके शिष्य नहीं रहे। यूँ भी आदिकाल से गुणीजनों को जबरन गुरु बना लेने की परम्परा का उल्लेख अपने यहाँ विविध शास्त्रों में मिलता है। गुणीजन भी उदारता बरतते हुए इस परम्परा में हस्तक्षेप नहीं करते थे, जब तक कि मामला दक्षिणा वसूलने तक न पहुँच जाए। गुरुकुल में प्रवेश के लिए राजाओं, मंत्रियों और सामन्तों के होनहार बालकों को कड़ी परीक्षा देनी पड़ती थी और डोनेशन वगैरह देकर ही वे शिष्य की पात्रता हासिल कर पाते थे।

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी-

वैसे तो हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता लेकिन जब बात सार्वजनिक हो जाए और खासतौर से वह आधुनिक जमाने की सोशल मीडिया का हिस्‍सा बन जाए तो खड़े किए गए प्रश्‍नों का प्रति उत्‍तर देना जरूरी हो जाता है। दूसरी दृष्‍ट‍ि से देखें तो यह भारतीय परंपरा भी है कि यदि कोई पक्ष है तो उसका विपक्ष होगा और यदि विपक्ष मौजूद है तो उसे अपनी बात सही संदर्भों के साथ तार्क‍िक ढंग से अवश्‍य कहनी चाहिए। भड़ास पर आज ही किसी मोहतरमा का लेख आया है जिसमें उन्‍होंने दक्षिण पंथि‍यों को इस बात के लिए आरोपित किया है कि वे भावनाओं की राजनीति करते हैं और भावनाएं उनके लिए किसी ब्रह्मास्‍त्र से कम नहीं हैं।

: गोनू झा कहिन (तीन) : विगत एक हफ्ते से गोनू झा ने गाँव के चौपाल में आ कर बैठना शुरू कर दिया क्यों कि वहां पर उनको सारे पुराने पंच, उनके समर्थक और एक दो मसखरे भी बैठे मिल जाते हैं और फिर कुछ न कुछ बात का बतंगड़ बन ही जाता है. कल शाम कर्नाटक के पूर्व मुख्यामंत्री बीएस यदुरप्पा के जेल जाने पर और रात में अस्पताल लौट आने पर पंचों के बीच में बहस छिड़ गयी और फिर जो तर्क-वितर्क की धारा बह निकली, उसका आनंद कुछ और ही था.

माँ दुनिया का सबसे अनमोल शब्द है। एक ऐसा शब्द जिसमें सिर्फ अपनापन, सेवा, समर्पण और प्यार झलकता है। माँ हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है। माँ शब्द जुबान पर आते ही एक नाम सहज ही सामने आता है और वह हैं मदर टरेसा का। कलियुग में वे मां का एक  आदर्श प्रतीक थी जो आज भी प्रेम की भांति सभी के दिलों में जीवित हैं। वे मानव बनकर संसार में आई। उनके जीवन की कहानी आकाश की उड़ान नहीं है। उनके स्वर कल्पना की लहरियों से नहीं उठे थे, बल्कि अनुभूति की कसौटी पर खरे उतरकर हमारे सामने आए थे। उनकी सतत गतिशील मानवता ने उन्हें महामानव बना दिया। जिसकी पृष्ठभूमि में विजय का संदेश है। वह विजय थी-अंधकार पर प्रकाश की, असत् पर सत् की, मानव उत्थान की और पीडित मानव मन पर मरहम की। वे शांति एवं सेवा का शंखनाद थी।

हमारे शहर के जुगाडू़ रामजी जन्मजात जुगाड़ू हैं। इस कदर पैदाइशी जुगाड़ू कि मां-बाप के परिवार नियोजन के तमाम संयुक्त प्रयासों को सिंगट्टा दिखाते हुए जुगाड़ू रामजी ने अपने पैदा होने का जुगाड़ लगा ही डाला। जुगाड़ू रामजी की इस दुर्दांत हाहाकारी प्रतिभा से प्रभावित होकर ही पराजित मां-बाप ने इनका नाम जुगाड़ू राम रखा। जैसा नाम वैसा काम। अपनी छोटी-सी जिंदगी में अपनी हैसियत और काबिलियत से ज्यादा बड़ी-बड़ी कामयाबियां जुगाड़ू रामजी ने जुगाड़ के बूते पर ही हथियाकर सभी योग्य सुपात्रों को चकरघन्नी बना दिया है।

एक बार एक कंपनी ने कुत्तों का ऐसा ग्रुप बनाया जो दूसरों के लिए काम करने के नाम पर मोटी फीस के बदले किराये पर दिया जाता था। कुत्तों को इस तरह ट्रेंड किया गया था कि वो किराए पर लेने वाले की सुरक्षा से ज़्यादा दूसरों पर भौंकने में ज़्यादा माहिर थे। एक बार किसी गांव का प्रधान जो पिछले कई साल से गांव पर राज कर रहा था उसके ख़िलाफ एक दूसरे प्रधान पद के उम्मीदवार की टीम ने इन कुत्तों को किराए पर मंगवा लिया। बस फिर क्या था रात दिन इन कुत्तों ने वर्तमान प्रधान के घर की तरफ मुंह करके इतना भौंका कि किसी के भी कान पड़ी आवाज़ तक आनी बंद हो गई। प्रधान भले ही कितना ही अच्छा काम करने का दावा करता रहा लेकिन कुत्तों के भौंकने की रफ्तार और उसके शोर के सामने किसी को प्रधान की आवाज़ तक सुनाई ही न दी। इतना ही नहीं प्रधान के ख़िलाफ कई दूसरे प्रत्याशी भी इसी शोर के बीच अपनी बात तक न रख सके। नतीजा कई सौ करोड़ रुपए में किराए पर लिये गये कुत्तों ने कई साल से जमे प्रधान के ख़िलाफ ऐसा माहौल बनाया कि बेचारा हार गया।

विद्वानों का मानना है कि सोना जितना पिटता है उतना ही निखरता है। इससे एक बात तो तय हो ही गई कि कोई उसी को ही पीटता है जिसे वह सोना समझता है। यह किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व या विचार का गैर-राजनैतिक जनमत संग्रह है। वो लोग बहुत दुखी रहते हैं जो कभी पिट नहीं पाते हैं। आहें भरते हैं कि हाय कितनी गहरी उपेक्षा है। कोई इस लायक भी नहीं समझ रहा कि हमें हल्का-सी ही सही मगर कोई पीट तो दे। पद्मश्री तो क्या एक अदद जूता मारने के भी काबिल नहीं समझ रहा ये समाज। कोई प्रायोजक नहीं मिल रहा। इस इवेंट के लिए। बेचारे पिटने का पूरा होमवर्क किए बैठे हैं कि कोई बैल आ मुझे मार। वे घिघियाते हैं कि अंधेरे में जो बैठे हैं, उनकी प्रतिभा को भी पहचानो। उसमें क्या खास है। तभी गहन-गंभीर आकाशवाणी होती है-पिटो तो जानो।

जयपुर : संघ लोकसेवा आयोग परीक्षा से संबंधित सुधारों पर कार्य करने के लिए बी एस बासवान समिति ने भारतीय सूचना सेवा में सुधार के सवाल पर हाथ खड़े कर दिये हैं, इससे इस सेवा में सुधार के लिए किये जा रहे प्रयासों को झटका लगा है। हालांकि समिति ने अभी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी नहीं है लेकिन भारतीय सूचना सेवा में सुधार के लिए छात्रों की ओर से किये जा रहे प्रयासों के जवाब में समिति के अध्यक्ष बी एस बासवान की ओर से जयपुर के छात्र श्याम शर्मा को ईमेल कर कहा गया है ‘भारतीय सूचना सेवा को सिविल सेवाओं में रखना या न रखना, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का काम है, समिति का नहीं। मुझे लगता है कि वे यथास्थिति बनाये रखना चाहते हैं।’

कुछ लोगों का मानना है कि दर्शन बड़ा ही टेढ़ा विषय है। और ये सिर्फ टेढ़े लोगों को ही नेचुरली सूट करता है। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि जितना जो दर्शन में गहरी डुबकी लगाता है उतना ही वो टेढ़ा होकर बाहर निकलता है। जैसे कि मिस्टर अष्टावक्र थे। जितने बड़े दार्शनिक, शरीर से उतने ही ज्यादा टेढ़े भी। हो सकता है दर्शन का शरीर पर ऐसा ही भौतिक-रासायनिक असर होता हो। सुकरात को सीधा करने के लिए सरकार को उसे जहर तक पिलाना पड़ा। मगर वे फिर भी मरते दम तक टेढ़े ही रहे। अब तो मुझे भी यकीन हो गया है कि दर्शन का प्रभाव ही टेढ़ा पड़ता है। विश्वास न हो तो किसी के सामने बस आप दर्शन का नाम भर ले दीजिए। देखिए कैसे उसकी भंवे टेढ़ी होती हैं और फिर क्रमशः उसका मुंह टेढ़ा होता जाता है।

मुझे हाल में ही किसी कारण से सीतापुर जाना हुआ। यहां मुझे पता चला कि पनरभू गांव में कच्ची शराब गोमती नदी पर बनती है और पुलिस कुछ नहीं बोलती है। सब कुछ उसकी देख रेख में होता है। इस हालात को देखने के लिए मैं पहुँच गया पनरभू गाँव। यहां दारू के बाद सेक्स की बात हो रही थी। गाँव का ही एक युवा कह रहा था, जिसकी शादी नहीं हुई है, कि वो बीस हजार में एक दिन के लिए दुल्हन ला सकता है और सुहाग रात आराम से मना सकता है। ऐसे हालत है वहां के। ये कहानी नहीं हकीकत है।

सड़कें हमारे भारत की प्राचीनतम ललित कलाओं में एक है इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि इन सड़कों का प्रचलन मोहनजोदड़ो और हड़प्पाकाल में भी खूब खुलकर हुआ करता था। सड़क पर महीन पच्चीकारी की जाती थी ताकि सड़क इतनी चिकनी न हो जाए कि उस पर चलनेवाले फिसल-फिसल जाएं। अगर धोखे से कोई एक-आध सड़क डिफेक्टिव यानी चिकनी बन जाती थी तो राज्य के आदेश से वहां तख्तियां लगा दी जाती थीं- सावधान सड़क चिकनी है। ध्यान दें आगे गड्ढारहित सड़क है। संभलकर चलें। अगर रपट जइयो तो हमें न बुलइयो। ऐसे तमाम खबरदार जुमले जनता को सावधान करने के लिए पूरी मुस्तैदी के साथ चिकनी सड़कों पर लगाए जाते थे। और ऐसी चिकनपट्ट सड़के बनानेवाले अपराधी ठेकेदारों को समारोहपूर्वक मृत्युदंड दे दिया जाता था। गड्ढेदार सड़कें हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं।

लखनऊ : भ्रष्ट आई.ए.एस. अधिकारियों के लिए यूपी एक अच्छी पनाहगाह हो सकती है क्योंकि जब लखनऊ के मानवाधिकार कार्यकर्ता और इंजीनियर संजय शर्मा ने नियुक्ति विभाग में एक आरटीआई दायर कर यूपी में तैनात आई.ए.एस. अधिकारियों के भ्रष्टाचार से सम्बंधित जानकारी लेनी चाही है तो सूबे की समाजवादी पार्टी की सरकार ने संजय को कोई भी सूचना नहीं दी है. बेहद चौंकाने वाली बात यह है कि यूपी की अखिलेश सरकार ने इस मानवाधिकार कार्यकर्ता को इन अधिकारियों के भ्रष्टाचार से सम्बंधित वे सूचनाएं देने से भी इनकार कर दिया है जिन्हें केंद्र की मोदी सरकार ने सी.वी.सी. की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया हुआ है.

: गोनू झा कहिन (एक) : एक शाम गोनू झा गाँव के तालाब के किनारे बड़ी चिंता में मग्न बैठे थे और किसी से बात ही नहीं कर रहे थे. कोई उनके पास जाता तो वो सामने ज़मीन पर बना हुआ नक्शा दिखा देते और फिर अपनी चिंता में मग्न हो जाते. आखिर गाँव के मुखिया ने ही सवाल पूछ लिया कि वो किस चीज की चिंता में इतने घुले जा रहे हैं. गोनू झा का जवाब था "मैं एक नए जेल का नक्शा और रूप रेखा बना रहा हूँ जो आगरा पागल खाना के बिल्‍कुल करीब हो और वहां पर हर किस्म की सुविधा हो." मगर परेशानी ये है कि इतनी ज़ल्दी सब कैसे होगा? मुखिया जी चौंक गए. बोले "अरे श्रीमान, आप क्यों परेशां है. ये काम तो सरकार का है?"

डा. राधेश्याम द्विवेदी

धार्मिक महत्व:- तुलसी के ऊपर एक पृथक पुराण लिखा जा सकता है, संक्षेप में तुलसी का धार्मिक सांस्कृतिक व औषधि जनित महत्व बताने की कोशिश कर रहा हूँ । विष्णु पुराण, ब्रह्म-पुराण, स्कन्द-पुराण, देवी भागवत पुराण के अनुसार तुलसी की उत्पति की अनेक कथाएँ हैं, पर एक कथा के अनुसार- समुन्द्र-मंथन करते समय जब अमृत निकला, तो कलश को देखकर श्रम की सार्थकता से वशीभूत होकर देवताओं के नेत्रों से अश्रुस्राव हो उठा और उन बूंदों से तुलसी वृक्ष उत्पन्न हुए । एक कथा के अनुसार तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था. वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.